राजस्थान के सीकर जिले में श्रीमाधोपुर क्षेत्र का नाथूसर गाँव ऐसा गाँव है, जहाँ घूमते हुए आपको सिर्फ ग्रामीण जीवन देखने को नहीं मिलता, बल्कि जगह-जगह इतिहास, लोक आस्था और पुरानी परंपराओं की झलक भी दिखाई देती है।
गाँव की पुरानी छतरियाँ, सदियों पुराने कुओं से जुड़ी कहानी, झुंझार जी का छोटा-सा मंदिर और सेना में सेवा देने वाले गाँव के वीर जवान नाथूसर को खास बनाते हैं।
स्थानीय जानकारी और गाँव से जुड़ी पुरानी परंपराओं के अनुसार, नाथूसर को करीब 500 साल पहले राजा रतन सिंह ने बसाया था। आज भी गाँव में राजा रतन सिंह की छतरी मौजूद है, जो यहाँ के पुराने इतिहास की एक खूबसूरत निशानी है।
पानी की कमी से शुरू हुई मीठे और खारे कुएँ की कहानी
नाथूसर के शुरुआती दिनों में गाँव के सामने सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी की थी। उस समय गाँव में पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी और महिलाओं को पानी लेने के लिए दूसरे गाँवों तक जाना पड़ता था।
गाँव के बुजुर्गों से चली आ रही कहानी के अनुसार, एक बार पड़ोसी गाँव की महिलाओं ने नाथूसर की महिलाओं को पानी के लिए दूसरे गाँव आने पर ताना मार दिया। यह बात नाथूसर के ग्रामीणों को बहुत बुरी लगी।
कहा जाता है कि इसके बाद ग्रामीणों ने उसी रात अपने गाँव में कुआँ खोदने का फैसला किया। रातभर मेहनत करके दो कुएँ खोदे गए।
सुबह जब दोनों कुओं का पानी देखा गया तो एक कुएँ में मीठा पानी निकला और दूसरे में खारा पानी।
इसके बाद दोनों की पहचान ही उनके पानी के स्वाद से होने लगी। एक कहलाया मीठा कुआँ और दूसरा खारिया कुआँ यानि खारा कुआँ।
आज ये कुएँ सिर्फ पानी के पुराने स्रोत नहीं हैं, बल्कि नाथूसर के लोगों की मेहनत, आत्मसम्मान और उस समय के ग्रामीण जीवन की कहानी भी अपने भीतर समेटे हुए हैं।
राजा रतन सिंह की खूबसूरत छतरी
नाथूसर घूमने आने वाले लोगों के लिए गाँव की सबसे खास पुरानी धरोहरों में से एक है राजा रतन सिंह की छतरी।
यह छतरी अपनी खूबसूरत पत्थर की नक्काशी और स्थापत्य के कारण देखने लायक है। छतरी आठ खंभों पर बनी हुई है और इसके खंभों, छत तथा गुंबद पर की गई कारीगरी आज भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती है।
छतरी के ऊपर बना गुंबद और उसके नीचे पत्थर पर की गई सजावट राजस्थान की पारंपरिक छतरी स्थापत्य शैली की सुंदर झलक देती है।
See also आमेर की विशाल सुरक्षा दीवार - Great Wall of Amer
छतरी के अंदर पत्थर पर एक पुराना लेख भी अंकित है। समय बीतने के साथ यह लेख काफी घिस चुका है, लेकिन आज भी इसके कुछ अक्षर दिखाई देते हैं। यह लेख इस जगह की पुरानी कहानी को समझने के लिए खास महत्व रखता है।
मेरे लिए इस छतरी की सबसे खास बात यह है कि यहाँ केवल एक पुरानी इमारत नहीं है, बल्कि नाथूसर की बसावट से जुड़ी स्थानीय स्मृतियों को आज भी महसूस किया जा सकता है।
पास ही है सती माता की छतरी
राजा रतन सिंह की छतरी के बिल्कुल पास ही एक दूसरी पुरानी छतरी भी बनी हुई है, जिसे स्थानीय लोग सती माता की छतरी के नाम से जानते हैं।
इस छतरी से जुड़ी एक स्थानीय जनश्रुति भी है। गाँव में ऐसा बताया जाता है कि एक माता अपने बेटे की मृत्यु के बाद उसकी याद में सती हो गई थीं और उनकी स्मृति से यह छतरी जुड़ी हुई है।
रतन सिंह की छतरी के पास झुंझार जी का मंदिर
राजा रतन सिंह की छतरी के पास ही एक छोटा-सा मंदिर है, जिसे स्थानीय लोग झुंझार जी का मंदिर कहते हैं।
राजस्थान की लोकपरंपरा में झुंझार जी वीरता और बलिदान से जुड़े लोकदेवताओं के रूप में पूजे जाते हैं। सीकर क्षेत्र में भी झुंझार जी की लोक-आस्था काफी पुरानी है। उपलब्ध संदर्भों में झुंझार जी को गाँव और गौ-रक्षा करते हुए वीरगति पाने वाले वीरों की परंपरा से जोड़ा गया है।
नाथूसर के इस छोटे से मंदिर की खास बात यहाँ लगी देवली है। देवली पर घोड़े पर सवार एक वीर योद्धा की आकृति उकेरी गई है।
राजस्थान में इस तरह की वीर-आकृतियाँ किसी वीर पुरुष की स्मृति और लोक आस्था से जुड़ी हुई मिलती हैं। नाथूसर में भी इस देवली को स्थानीय श्रद्धा में झुंझार जी से जोड़ा जाता है।
मंदिर बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन गाँव की पुरानी लोक आस्था को समझने के लिए यह छोटी-सी जगह काफी महत्वपूर्ण है।
वीरों की धरती भी है नाथूसर
नाथूसर की पहचान केवल पुरानी छतरियों और मंदिरों तक सीमित नहीं है। गाँव के लोग सेना और सुरक्षा बलों में सेवा देने की परंपरा के लिए भी जाने जाते हैं।
गाँव के कई युवा भारतीय सेना में गए और देश की सेवा की। रिपोर्ट के अनुसार, नाथूसर के लोगों ने भारत-पाकिस्तान युद्ध, भारत-चीन युद्ध और कारगिल युद्ध जैसे महत्वपूर्ण युद्धों में भी अपनी भूमिका निभाई।
यही वजह है कि नाथूसर को स्थानीय तौर पर वीरों की धरती के रूप में भी याद किया जाता है। गाँव में शहीदों और सैनिकों की स्मृति को सम्मान देने के लिए खेल प्रतियोगिताओं जैसे आयोजन भी किए जाते हैं।
स्वर्णकारी ने भी बनाई नाथूसर की पहचान
नाथूसर की एक और पुरानी पहचान यहाँ के स्वर्णकार कारीगरों से जुड़ी रही है।
गाँव के स्वर्णकार सोने के आभूषण बनाने में अपनी बारीक कारीगरी के लिए जाने जाते थे। पारंपरिक डिजाइन और नक्काशी वाले आभूषणों ने यहाँ के कारीगरों को गाँव से बाहर भी पहचान दिलाई।
बताया जाता है कि नाथूसर की इस कारीगरी की पहचान दूर तक थी और इसका संबंध मारवाड़ तक बताया जाता है। हालांकि समय के साथ कई कारीगर जयपुर चले गए, लेकिन स्वर्णकारी की यह परंपरा नाथूसर की पुरानी पहचान का हिस्सा रही है।
नाथूसर सिर्फ एक गाँव नहीं, एक अनुभव है
नाथूसर की खासियत यही है कि यहाँ आपको कोई बहुत बड़ा किला या महल देखने को नहीं मिलेगा। इसके बजाय गाँव की छोटी-छोटी जगहें इसकी कहानी बताती हैं।
एक पुरानी छतरी आपको राजा रतन सिंह की याद दिलाती है, पास की दूसरी छतरी एक लोककथा सुनाती है, झुंझार जी का छोटा मंदिर गाँव की वीर परंपरा से जोड़ता है और मीठा-खारा कुआँ उस दौर की याद दिलाता है, जब पानी के लिए भी ग्रामीणों को संघर्ष करना पड़ता था।
और जब इसी गाँव के युवाओं के सेना में जाने और देश के लिए बलिदान देने की बात सामने आती है, तो नाथूसर की पहचान और भी खास हो जाती है।
