मेवाड़ की वह नगरी जिसका मौर्य वंश से था संबंध - Delwara Jain Temples History

Delwara Jain Temples History, इसमें उदयपुर के कैलाशपुरी के पास 2200 साल पुरानी नगरी देलवाड़ा और उसमें मौजूद जैन मंदिरों के बारे में जानकारी है।

Delwara Jain Temples History

राजस्थान की धरती अपने किलों, महलों और प्राचीन मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में एक नाम है देलवाड़ा, जो राजसमंद और उदयपुर के बीच अरावली पर्वतमाला की सुंदर वादियों में बसा हुआ है।

आज का शांत और छोटा-सा दिखने वाला देलवाड़ा गांव कभी एक विशाल और समृद्ध नगर हुआ करता था। इतिहास में इसे देवकुलपाटक के नाम से जाना जाता था। यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि इतिहास, कला और संस्कृति की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

आइए जानते हैं इस अद्भुत नगर और इसके प्राचीन जैन मंदिरों का गौरवशाली इतिहास।

📜 2200 साल पुराना इतिहास


प्राप्त जानकारी के अनुसार, देलवाड़ा का इतिहास 2200 वर्ष से भी पुराना माना जाता है।

कहा जाता है कि मौर्य सम्राट अशोक के पौत्र सम्राट संप्रति ने यहां अनेक जैन मंदिरों का निर्माण करवाया था और जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं स्थापित करवाई थीं। उस समय यह नगर जैन धर्म का एक बड़ा केंद्र माना जाता था।

🏛️ क्यों पड़ा नाम 'देवकुलपाटक'?


प्राचीन काल में इस नगर में बड़ी संख्या में सुंदर और कलात्मक मंदिर बने हुए थे। मंदिरों की इसी अधिकता के कारण इस स्थान को देवकुलपाटक कहा जाने लगा।

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि यहां कभी लगभग 1400 मंदिर मौजूद थे। मंदिरों की भव्यता और धार्मिक महत्व के कारण यह नगर दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

🌟 कभी यहां थे 365 जैन मंदिर


देलवाड़ा को जैन धर्म का एक प्रमुख तीर्थ माना जाता था। ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि यहां कभी 365 जैन मंदिर हुआ करते थे।

समय के साथ प्राकृतिक आपदाओं, आक्रमणों और अन्य कारणों से अधिकांश मंदिर नष्ट हो गए। आज यहां केवल चार प्रमुख जैन मंदिर शेष बचे हैं—

👉 भगवान आदेश्वर (ऋषभदेव) मंदिर
👉 भगवान पार्श्वनाथ मंदिर
👉 भगवान महावीर स्वामी मंदिर
👉 छोटा आदेश्वर मंदिर

ये मंदिर आज भी इस प्राचीन नगरी के गौरवशाली इतिहास की कहानी सुनाते हैं।

👑 मेवाड़ के शासकों का विश्वसनीय केंद्र


13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच देलवाड़ा मेवाड़ राज्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था।

मेवाड़ के कई प्रसिद्ध शासकों का इस नगर से विशेष संबंध रहा। इनमें—

👉 राणा हमीर
👉 राणा खेता
👉 राणा लाखा
👉 राणा मोकल
👉 महाराणा कुंभा
👉 महाराणा उदय सिंह
👉 महाराणा प्रताप

जैसे महान शासकों के नाम शामिल हैं।

देलवाड़ा को मेवाड़ के शासकों की एक विश्वसनीय और महत्वपूर्ण स्थली माना जाता था।

🔍 2008 की खुदाई में मिला इतिहास का अनमोल खजाना


देलवाड़ा का सबसे चर्चित और आश्चर्यजनक प्रसंग वर्ष 2008 में सामने आया।


उस समय सांवलिया पार्श्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य चल रहा था। मंदिर के गर्भगृह के नीचे बने एक पुराने तहखाने की खुदाई की गई। खुदाई के दौरान जो मिला, उसने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया।

✨ 108 किलो वजनी महावीर स्वामी की प्रतिमा


तहखाने से भगवान महावीर स्वामी की एक अत्यंत सुंदर और प्राचीन प्रतिमा प्राप्त हुई।

इस प्रतिमा की विशेषताएं—

👉 अष्टधातु से निर्मित
👉 लगभग 108 किलो वजनी
👉 लगभग 21 इंच ऊंची
👉 उत्कृष्ट कलात्मक नक्काशी से युक्त

प्रतिमा के पीछे अष्टधातु का भव्य परिकर बना हुआ है, जिसमें जैन मुनियों तथा हाथियों की सुंदर आकृतियां दिखाई देती हैं।

🗿 मिलीं 6 अन्य प्राचीन प्रतिमाएं


खुदाई लगभग 13 फीट गहराई तक की गई। इस दौरान मुख्य प्रतिमा के साथ 6 अन्य प्राचीन जैन प्रतिमाएं भी प्राप्त हुईं।

बाद में मंदिर के पुनर्निर्माण के पश्चात इन सभी प्रतिमाओं को पुनः स्थापित कर दिया गया।

🙏 587 वर्ष पुरानी प्रतिमा भी है यहां


मंदिर परिसर में भगवान महावीर स्वामी की एक अन्य प्राचीन प्रतिमा भी स्थापित है, जिसकी आयु लगभग 587 वर्ष बताई जाती है।

इस कारण यह मंदिर जैन श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

🏗️ मंदिर का पुनर्निर्माण


ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, मंदिर का निर्माण मेवाड़ के महाराणा कुंभा के प्रसिद्ध दीवान सहनपाल नवलखा द्वारा करवाया गया था।

समय के साथ मंदिर पुराना और जर्जर हो गया था। इसलिए वर्ष 2017 में इसका भव्य पुनर्निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया।

कई वर्षों तक चले इस कार्य के बाद मंदिर का पुनः निर्माण और प्रतिष्ठा समारोह धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। आज यह मेवाड़ के प्रमुख जैन तीर्थस्थलों में गिना जाता है।

🎯 निष्कर्ष


देलवाड़ा केवल एक गांव या मंदिर नहीं है, बल्कि यह भारत के प्राचीन इतिहास, जैन धर्म, मौर्यकालीन विरासत और मेवाड़ के गौरवशाली अतीत का जीवंत प्रमाण है।

2200 वर्ष पुराना इतिहास, कभी मौजूद 365 जैन मंदिर, मेवाड़ के शासकों से जुड़ा गौरव और 2008 की खुदाई में मिली 108 किलो वजनी महावीर स्वामी की प्रतिमा—ये सभी बातें देलवाड़ा को राजस्थान की सबसे रोचक ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल करती हैं।

यदि आप इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को करीब से देखना चाहते हैं, तो अरावली की गोद में बसे इस ऐतिहासिक देवकुलपाटक अर्थात देलवाड़ा की यात्रा अवश्य करनी चाहिए।



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डिस्क्लेमर (Disclaimer)

इस लेख में शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। आलेख की जानकारी को पाठक महज सूचना के तहत ही लें क्योंकि इसे आपको केवल जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।
Ramesh Sharma

मेरा नाम रमेश शर्मा है। मैं एक रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट हूँ और मेरी शैक्षिक योग्यता में M Pharm (Pharmaceutics), MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA और CHMS शामिल हैं। मुझे भारत की ऐतिहासिक धरोहरों और धार्मिक स्थलों को करीब से देखना, उनके पीछे छिपी कहानियों को जानना और प्रकृति की गोद में समय बिताना बेहद पसंद है। चाहे वह किला हो, महल, मंदिर, बावड़ी, छतरी, नदी, झरना, पहाड़ या झील, हर जगह मेरे लिए इतिहास और आस्था का अनमोल संगम है। इतिहास का विद्यार्थी होने की वजह से प्राचीन धरोहरों, स्थानीय संस्कृति और इतिहास के रहस्यों में मेरी गहरी रुचि है। मुझे खास आनंद तब आता है जब मैं कलियुग के देवता बाबा खाटू श्याम और उनकी पावन नगरी खाटू धाम से जुड़ी ज्ञानवर्धक और उपयोगी जानकारियाँ लोगों तक पहुँचा पाता हूँ। इसके साथ मुझे अलग-अलग एरिया के लोगों से मिलकर उनके जीवन, रहन-सहन, खान-पान, कला और संस्कृति आदि के बारे में जानना भी अच्छा लगता है। साथ ही मैं कई विषयों के ऊपर कविताएँ भी लिखने का शौकीन हूँ। एक फार्मासिस्ट होने के नाते मुझे रोग, दवाइयाँ, जीवनशैली और हेल्थकेयर से संबंधित विषयों की भी अच्छी जानकारी है। अपनी शिक्षा और रुचियों से अर्जित ज्ञान को मैं ब्लॉग आर्टिकल्स और वीडियो के माध्यम से आप सभी तक पहुँचाने का प्रयास करता हूँ।

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