कुंभलगढ़ के जंगल में मौजूद पृथ्वीराज सिसोदिया की दूसरी छतरी - Cenotaph of Prithviraj Sisodia in Kumbhalgarh Forest

Cenotaph of Prithviraj Sisodia in Kumbhalgarh Forest, इसमें महाराणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज सिसोदिया की कुंभलगढ़ के जंगल में मौजूद दूसरी छतरी के बारे में जानकारी है।

Cenotaph of Prithviraj Sisodia in Kumbhalgarh Forest

राजस्थान का कुम्भलगढ़ दुर्ग अपनी विशाल प्राचीर, भव्य महलों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। लेकिन इसी दुर्ग से जुड़ा एक ऐसा रहस्य भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

यह रहस्य है महाराणा रायमल के ज्येष्ठ पुत्र और महाराणा सांगा के बड़े भाई कुँवर पृथ्वीराज सिसोदिया की दो छतरियों का।

अधिकांश पर्यटक कुम्भलगढ़ दुर्ग के भीतर स्थित पृथ्वीराज सिसोदिया की प्रसिद्ध छतरी को ही जानते हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि कुम्भलगढ़ के पश्चिमी जंगल में, हीराबारी मार्ग पर भी एक छोटी चार-खंभों वाली छतरी स्थित है। स्थानीय लोग भी इसे पृथ्वीराज सिसोदिया की छतरी के नाम से जानते हैं।

आइए जानते हैं कि इन दोनों छतरियों के बारे में इतिहास क्या कहता है और स्थानीय जनश्रुति में क्या माना जाता है।

पृथ्वीराज सिसोदिया कौन थे?

कुँवर पृथ्वीराज सिसोदिया, मेवाड़ के महाराणा रायमल के सबसे बड़े पुत्र तथा महाराणा सांगा के बड़े भाई थे। वे अपने समय के अत्यंत वीर और पराक्रमी योद्धा माने जाते थे। उनकी युद्ध-कुशलता और तीव्र गति के कारण उन्हें "उड़ना पृथ्वीराज" या "उड़वा राजकुमार" भी कहा जाता था। उन्होंने मेवाड़ की रक्षा और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पृथ्वीराज सिसोदिया की मृत्यु

उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार पृथ्वीराज सिसोदिया अपनी बहन आनंदाबाई के साथ हुए दुर्व्यवहार का विरोध करने सिरोही गए थे। बाद में बहन के आग्रह पर उन्होंने सिरोही के शासक राव जगमाल को क्षमा कर दिया।

वापसी के समय राव जगमाल ने उन्हें विदाई स्वरूप माजून (औषधीय मिठाई) की गोलियाँ भेंट कीं। इतिहासकारों के अनुसार उन गोलियों में विष मिला हुआ था।

जेम्स टॉड और हर बिलास सारदा जैसे इतिहासकारों के अनुसार कुम्भलगढ़ दिखाई देने पर पृथ्वीराज ने वह माजून खाया। विष का प्रभाव बढ़ता गया और मामादेव के स्थान तक पहुँचते-पहुँचते वे आगे नहीं चल सके। वहीं उनका देहांत हो गया।

पहली छतरी – कुम्भलगढ़ दुर्ग के भीतर

कुम्भलगढ़ दुर्ग के भीतर मामादेव मंदिर के पास स्थित यह छतरी पृथ्वीराज सिसोदिया का सबसे प्रसिद्ध स्मारक मानी जाती है।

UNESCO के कुम्भलगढ़ नामांकन दस्तावेज़ में भी इस छतरी का उल्लेख "Prithviraj Ki Chhatri (C1)" के रूप में मिलता है। इस स्मारक के मध्य में एक स्मृति-स्तंभ भी है, जिस पर पृथ्वीराज सिसोदिया के जीवन से जुड़े प्रसंगों और उनके साथ सती हुई रानियों का उल्लेख बताया जाता है।

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इसी कारण अधिकांश इतिहासकार और पुरातत्व विभाग इस छतरी को पृथ्वीराज सिसोदिया का आधिकारिक स्मारक मानते हैं।

दूसरी छतरी – हीराबारी मार्ग की छोटी चार-खंभों वाली छतरी

कुम्भलगढ़ दुर्ग के पश्चिमी भाग में, जंगल के बीच, मारवाड़ की ओर जाने वाले प्राचीन मार्ग पर एक छोटी चार-खंभों वाली छतरी स्थित है।

इस पुराने मार्ग को स्थानीय लोग हीराबारी मार्ग के नाम से जानते हैं। वर्तमान में कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य की सफारी भी इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है।

Prithviraj Ki Chhatri

स्थानीय लोगों, सफारी गाइडों और आसपास के ग्रामीणों के अनुसार यह भी पृथ्वीराज सिसोदिया की छतरी है। इस स्थान पर कई जगह "पृथ्वीराज की छतरी" लिखा हुआ भी देखा जा सकता है।

इसी कारण वर्षों से यह स्थान स्थानीय लोगों के बीच पृथ्वीराज सिसोदिया की स्मृति से जुड़ा हुआ माना जाता है।

हीराबारी वाली छतरी से जुड़ी जनश्रुति

कुम्भलगढ़ क्षेत्र में एक रोचक जनश्रुति प्रचलित है।

स्थानीय लोगों के अनुसार सिरोही से लौटते समय विष के प्रभाव से कुँवर पृथ्वीराज सिसोदिया ने हीराबारी मार्ग के इसी क्षेत्र में अंतिम सांस ली थी। इसी कारण यहाँ उनकी स्मृति में सबसे पहले यह छोटी चार-खंभों वाली छतरी बनाई गई।

जनश्रुति में आगे यह भी कहा जाता है कि इसके बाद उनका पार्थिव शरीर कुम्भलगढ़ दुर्ग के भीतर ले जाया गया, जहाँ उनकी स्मृति में दूसरी और अधिक भव्य छतरी का निर्माण किया गया।

यह कथा आज भी स्थानीय लोगों, गाइडों और इस क्षेत्र से जुड़े लोगों द्वारा सुनाई जाती है।

इतिहास और जनश्रुति में अंतर

उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत पृथ्वीराज सिसोदिया की मृत्यु कुम्भलगढ़ में होने का उल्लेख करते हैं तथा मामादेव मंदिर के निकट स्थित स्मारक का विवरण भी देते हैं।

वहीं हीराबारी मार्ग की छोटी चार-खंभों वाली छतरी को पृथ्वीराज सिसोदिया का मृत्यु-स्थल मानने की बात मुख्य रूप से स्थानीय जनश्रुति और स्थानीय मान्यताओं में मिलती है। वर्तमान में उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत इस जनश्रुति की स्पष्ट पुष्टि नहीं करते, लेकिन स्थानीय परंपरा में यह कथा लंबे समय से प्रचलित है।

आज भी आकर्षण का केंद्र

आज भी कुम्भलगढ़ सफारी के दौरान हीराबारी मार्ग पर स्थित यह छोटी छतरी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। दूसरी ओर, कुम्भलगढ़ दुर्ग के भीतर स्थित भव्य छतरी पृथ्वीराज सिसोदिया की वीरता और स्मृति की याद दिलाती है।

इन दोनों छतरियों के कारण पृथ्वीराज सिसोदिया का इतिहास और उनसे जुड़ी जनश्रुतियाँ आज भी कुम्भलगढ़ की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं।

निष्कर्ष

कुँवर पृथ्वीराज सिसोदिया मेवाड़ के सबसे वीर राजकुमारों में गिने जाते हैं। कुम्भलगढ़ में उनसे जुड़ी दो छतरियाँ आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं।

दुर्ग के भीतर स्थित छतरी का उल्लेख ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलता है, जबकि हीराबारी मार्ग पर स्थित छोटी चार-खंभों वाली छतरी के बारे में स्थानीय लोगों में यह जनश्रुति प्रचलित है कि यह वही स्थान है जहाँ विष के प्रभाव से पृथ्वीराज ने अंतिम सांस ली थी। इतिहास और जनश्रुति—दोनों मिलकर इस स्थान को और भी रोचक तथा रहस्यमय बना देते हैं।

यह संस्करण आपकी कार्यशैली के अनुरूप है—जहाँ इतिहास है वहाँ इतिहास, और जहाँ स्थानीय परंपरा है वहाँ उसे स्पष्ट रूप से जनश्रुति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इससे लेख संतुलित भी रहता है और पाठकों का विश्वास भी बना रहता है।

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Ramesh Sharma

नमस्ते! मेरा नाम रमेश शर्मा है। मैं एक रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट हूँ और मेरी शैक्षिक योग्यता में M Pharm (Pharmaceutics), MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA और CHMS शामिल हैं। मुझे भारत की ऐतिहासिक धरोहरों और धार्मिक स्थलों को करीब से देखना, उनके पीछे छिपी कहानियों को जानना और प्रकृति की गोद में समय बिताना बेहद पसंद है। चाहे वह किला हो, महल, मंदिर, बावड़ी, छतरी, नदी, झरना, पहाड़ या झील, हर जगह मेरे लिए इतिहास और आस्था का अनमोल संगम है। इतिहास का विद्यार्थी होने की वजह से प्राचीन धरोहरों, स्थानीय संस्कृति और इतिहास के रहस्यों में मेरी गहरी रुचि है। मुझे खास आनंद तब आता है जब मैं कलियुग के देवता बाबा खाटू श्याम और उनकी पावन नगरी खाटू धाम से जुड़ी ज्ञानवर्धक और उपयोगी जानकारियाँ लोगों तक पहुँचा पाता हूँ। इसके साथ मुझे अलग-अलग एरिया के लोगों से मिलकर उनके जीवन, रहन-सहन, खान-पान, कला और संस्कृति आदि के बारे में जानना भी अच्छा लगता है। साथ ही मैं कई विषयों के ऊपर कविताएँ भी लिखने का शौकीन हूँ। एक फार्मासिस्ट होने के नाते मुझे रोग, दवाइयाँ, जीवनशैली और हेल्थकेयर से संबंधित विषयों की भी अच्छी जानकारी है। अपनी शिक्षा और रुचियों से अर्जित ज्ञान को मैं ब्लॉग आर्टिकल्स और वीडियो के माध्यम से आप सभी तक पहुँचाने का प्रयास करता हूँ। 📩 किसी भी जानकारी या संपर्क के लिए आप मुझे यहाँ लिख

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