राजस्थान के पाली जिले में स्थित रणकपुर आज विश्वविख्यात जैन मंदिर के कारण जाना जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह क्षेत्र कभी मेवाड़ और मुगल साम्राज्य के बीच संघर्ष का महत्वपूर्ण रणक्षेत्र भी रहा था।
रणकपुर के पास अरावली की घाटियाँ, आवड़-सावड़ की पहाड़ियाँ और गोडवाड़ का यह इलाका सदियों तक सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहे।
रणकपुर की इन्हीं पहाड़ियों के बीच स्थित एक छोटी-सी छतरी आज भी उस इतिहास की मूक साक्षी मानी जाती है, जिसे स्थानीय लोग राजराणा देदा जी झाला की छतरी के नाम से जानते हैं।
गोडवाड़ क्या था?
गोडवाड़ राजस्थान का वह ऐतिहासिक क्षेत्र था जो अरावली पर्वतमाला के पश्चिमी भाग में फैला हुआ था। इसमें वर्तमान पाली जिले का दक्षिणी भाग, सादड़ी, घाणेराव, रणकपुर, देसूरी और आसपास का क्षेत्र शामिल माना जाता है।
मध्यकाल में गोडवाड़ केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था, बल्कि मेवाड़, मारवाड़ और गुजरात को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण संपर्क क्षेत्र था। जो शक्ति गोडवाड़ को नियंत्रित करती थी, वह व्यापारिक मार्गों और पर्वतीय दर्रों पर भी नियंत्रण रखती थी।
मेवाड़ और गोडवाड़ का संबंध
आज भले ही रणकपुर पाली जिले में स्थित है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र लंबे समय तक मेवाड़ के प्रभाव क्षेत्र में रहा।
मेवाड़ की राजधानी चाहे चित्तौड़ रही हो, कुंभलगढ़ या चावंड, पश्चिम की ओर जाने वाले मार्ग गोडवाड़ से होकर ही गुजरते थे। इसलिए गोडवाड़ को अक्सर मेवाड़ का पश्चिमी द्वार कहा जाता था।
महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप और महाराणा अमर सिंह – सभी के काल में गोडवाड़ सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
रणकपुर की भौगोलिक स्थिति
रणकपुर अरावली पर्वतमाला की घनी पहाड़ियों और घाटियों के बीच स्थित है। यहाँ से गुजरने वाले मार्ग:
मेवाड़ को मारवाड़ से जोड़ते थे।
मेवाड़ को गुजरात से जोड़ते थे।
व्यापार और सैन्य आवागमन के लिए उपयोग किए जाते थे।
इसी कारण रणकपुर केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि एक सामरिक चौकी भी था।
आवड़-सावड़ की पहाड़ियाँ
स्थानीय परंपरा में रणकपुर और देसूरी क्षेत्र की अरावली पर्वतमाला के कुछ हिस्सों को आवड़-सावड़ (आवल-सावल) की पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है।
रणकपुर (गोडवाड़ एरिया) और सायरा के बीच में पहाड़ी दर्रे वाला एरिया है। गोगुंदा से सायरा होकर नालों और पहाड़ी रास्ते के जरिए रणकपुर- सादड़ी (गोडवाड़) होकर मारवाड़ जाया जाता है।
यहाँ पर कई नाले हैं जिनमें चित्रावास की नाल, चापों की नाल, रावछ की नाल, भाणपुरा की नाल और रणकपुर की नाल आदि हैं।
आवड़-सावड़ की पहाड़ियों की विशेषताएँ थीं:
घने जंगल
संकरी घाटियाँ
प्राकृतिक दर्रे
छिपकर युद्ध करने के लिए उपयुक्त भूभाग
महाराणा प्रताप और बाद में महाराणा अमर सिंह की सेनाओं ने अरावली के इसी दुर्गम भूभाग का उपयोग मुगलों के विरुद्ध किया।
यही कारण है कि मुगल सेना को इस क्षेत्र में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
रणकपुर जैन मंदिर और इसका सामरिक महत्व
आज रणकपुर का नाम सुनते ही चौमुखा जैन मंदिर की भव्यता सामने आती है और अधिकांश लोग रणकपुर को केवल जैन मंदिर के कारण जानते हैं।
लेकिन 16वीं और 17वीं शताब्दी में यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं था।
यह पहाड़ी मार्गों के बीच स्थित था।
यात्रियों और व्यापारियों का पड़ाव था।
आसपास के क्षेत्र पर नियंत्रण का प्रतीक था।
मेवाड़ का सामरिक सीमा क्षेत्र था।
गोडवाड़ का महत्वपूर्ण भाग था।
अरावली के प्राकृतिक किले का हिस्सा था।
मुगल-मेवाड़ संघर्ष का एक रणक्षेत्र था।
राजपूत वीरता और बलिदान की भूमि था।
इसी कारण युद्ध के समय यह क्षेत्र भी संघर्ष का केंद्र बन जाता था।
स्थानीय परंपराओं में यह माना जाता है कि रणकपुर के मंदिरों की रक्षा के लिए भी अनेक राजपूत वीरों ने युद्ध किया।
महाराणा अमर सिंह और मुगल संघर्ष
1597 ईस्वी में महाराणा प्रताप के निधन के बाद उनके पुत्र महाराणा अमर सिंह मेवाड़ के शासक बने। उन्होंने अपने पिता की नीति को आगे बढ़ाया और मुगलों के सामने समर्पण करने से इंकार कर दिया।
जहाँगीर ने मेवाड़ को अधीन करने के लिए कई अभियान भेजे। इसी दौरान मुगल सेनापति अब्दुल्ला खान को मेवाड़ अभियान की जिम्मेदारी दी गई।
अब्दुल्ला खान अरावली क्षेत्र और मेवाड़ के भूगोल से परिचित माना जाता था। उसने मेवाड़ पर दबाव बढ़ाने के लिए कई सैन्य कार्रवाइयाँ कीं।
1611 ईस्वी का राणापुर (रणकपुर) युद्ध
स्थानीय इतिहास और राजपूत परंपराओं में 1611 ईस्वी के आसपास राणापुर के युद्ध का उल्लेख मिलता है। उस समय रणकपुर क्षेत्र को कई स्रोतों में "राणापुर" या "रनपुर" भी कहा गया है।
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कहा जाता है कि:
मुगल सेनापति अब्दुल्ला खान की सेना इस क्षेत्र में पहुँची।
मेवाड़ की ओर से देवगढ़ के रावत दूदा के नेतृत्व में अनेक राजपूत सरदारों ने मुकाबला किया।
युद्ध रणकपुर की घाटियों और पर्वतीय मार्गों के आसपास हुआ।
युद्ध का उद्देश्य क्षेत्रीय नियंत्रण और मार्गों की सुरक्षा था।
बताया जाता है कि युद्ध में मेवाड़ी सेना की विजय हुई। युद्ध के बाद मेवाड़ के अधिकार में गोडवाड़ का वह एरिया वापस आ गया जो पहले मुगलों के अधिकार में चला गया था।
युद्ध में कई राजपूत सरदार शहीद हुए जिनमें रावत दूदा, झाला देदा, हरीदास राठौड़ आदि शामिल थे।
राजराणा देदा झाला और उनकी छतरी
स्थानीय राजपूत परंपराओं और क्षेत्रीय इतिहास के अनुसार राजराणा देदा जी झाला, मेवाड़ के एक वीर सरदार थे। ये हल्दीघाती के युद्ध में शहीद हुए बड़ी सादड़ी के झाला मान के पुत्र थे।
माना जाता है कि राणापुर के युद्ध में उन्होंने वीरतापूर्वक युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की।
उनकी स्मृति में रणकपुर घाटी में एक छतरी का निर्माण कराया गया, जिसे आज भी स्थानीय लोग देदा जी की छतरी के नाम से जानते हैं।
सायरा से रणकपुर की ओर जाने वाले मार्ग पर हाथी पुल के आगे जाने पर एक घुमाव के पास पहाड़ की तलहटी में नीचे उतरने के बाद यह छतरी आज भी देखी जा सकती है।
इस घुमाव वाली पहाड़ी पर थोड़ी ऊँचाई पर एक छोटा वाच टॉवर बना है। आगे इस छतरी की गूगल लोकैशन दी गई है। इस एरिया में जंगली जानवर हैं तो कभी भी अकेले जाने का खतरा ना उठाएँ।
देदा जी की छतरी की विशेषताएँ:
पत्थर के स्तंभों पर निर्मित स्मारक
बीच में वीर स्मृति-शिला (पलिया/देवली)
जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित स्थान
युद्ध स्मारक जैसी संरचना
वर्तमान में उपलब्ध स्थानीय परंपराएँ इसे राजराणा देदा जी झाला की छतरी बताती हैं।
गोडवाड़ का रणनीतिक महत्व
यदि मानचित्र पर देखा जाए तो:
उत्तर में मारवाड़
पूर्व में मेवाड़
दक्षिण-पश्चिम में गुजरात
इन तीनों क्षेत्रों के बीच स्थित होने के कारण गोडवाड़ का महत्व बहुत अधिक था।
जो शक्ति गोडवाड़ को नियंत्रित करती थी, वह:
व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण रखती थी।
पर्वतीय दर्रों की निगरानी करती थी।
गुजरात और मेवाड़ के बीच संपर्क नियंत्रित करती थी।
इसी कारण यह क्षेत्र बार-बार युद्धों का केंद्र बना।
गोड़वाड़ पर्यटन सर्किट
गोड़वाड़ एरिया अरावली की घाटियों, ऐतिहासिक दुर्गों, जैन मंदिरों, वन्यजीवों और लोक संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है इसलिए अब इसे पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित किया जा रहा है।
गोड़वाड़ पर्यटन सर्किट राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी भाग का प्रमुख सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन क्षेत्र है, जिसमें पाली, जालौर, सिरोही और बाड़मेर जिले शामिल हैं।
- पाली – रणकपुर जैन मंदिर अपनी अद्वितीय संगमरमर नक्काशी और 1444 विशिष्ट स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है। जवाई बाँध तेंदुआ सफारी और प्रवासी पक्षियों के लिए जाना जाता है, जबकि सोनाणा खेतलाजी मंदिर प्रमुख आस्था केंद्र है।
- जालौर – जालौर दुर्ग, सुंधा माता मंदिर और सिर मंदिर यहाँ के प्रमुख आकर्षण हैं।
- सिरोही – माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है। दिलवाड़ा जैन मंदिर विश्वविख्यात संगमरमर शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि अधर देवी मंदिर और नक्की झील प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।
- बाड़मेर – आसोतरा ब्रह्मा मंदिर तथा किराडू मंदिर अपनी धार्मिक एवं स्थापत्य विरासत के लिए प्रसिद्ध हैं।
निष्कर्ष
रणकपुर की घाटियाँ, आवड़-सावड़ की पहाड़ियाँ, गोडवाड़ का क्षेत्र और देदा जी की छतरी – ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए इतिहास के अध्याय हैं।
यद्यपि राणापुर युद्ध और देदा जी झाला के बारे में विस्तृत समकालीन अभिलेख सीमित हैं, फिर भी स्थानीय परंपराएँ, क्षेत्रीय इतिहास और उपलब्ध उल्लेख यह संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र महाराणा अमर सिंह और मुगल सेनापति अब्दुल्ला खान के संघर्षों का साक्षी रहा है।
रणकपुर का जैन मंदिर जहाँ आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है, वहीं उसकी घाटियों में स्थित यह छतरी उस वीरता की याद दिलाती है जिसने मेवाड़ की स्वतंत्रता और गोडवाड़ की सुरक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
