Raja Jai Singh Ke Guru Ratnakar Poundrik, इसमें आमेर के राजा सवाई जयसिंह के गुरु रत्नाकर पौंड्रिक, उनकी हवेली, पौंड्रिक गुरु चरण मंदिर की जानकारी है।
जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के बारे में तो लगभग हर कोई जानता है, लेकिन उनके दरबार से जुड़े एक महत्वपूर्ण विद्वान रत्नाकर पौंड्रिक के बारे में बहुत कम चर्चा होती है।
जयपुर के इतिहास में उनका स्थान केवल एक राजपुरोहित के रूप में नहीं, बल्कि महाराजा के गुरु, ज्योतिष एवं तंत्र के विद्वान और वैदिक परंपराओं के ज्ञाता के रूप में भी सामने आता है।
आज भी जयपुर में पौंड्रिक जी की हवेली, पौंड्रिक गुरु चरण मंदिर और पौंड्रिक पार्क जैसे नाम इस ऐतिहासिक व्यक्तित्व की याद दिलाते हैं।
रत्नाकर भट्ट से कैसे बने रत्नाकर पौंड्रिक?
रत्नाकर पौंड्रिक का मूल नाम रत्नाकर भट्ट था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार वे मूल रूप से महाराष्ट्र से थे और ज्योतिष तथा तंत्र का उच्च अध्ययन करने के लिए उस समय भारत के प्रमुख ज्ञान केंद्र काशी यानी वाराणसी गए थे।
काशी में ही उनकी मुलाकात आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय से हुई।
सवाई जयसिंह स्वयं खगोल विज्ञान, गणित, ज्योतिष और भारतीय ज्ञान परंपरा में गहरी रुचि रखने वाले शासक थे। वे रत्नाकर भट्ट की विद्वत्ता से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें अपने साथ काशी से आमेर-जयपुर ले आए।
महाराजा ने उन्हें अपना राजपुरोहित नियुक्त किया और उन्हें ‘पौंड्रिक’ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद रत्नाकर भट्ट इतिहास में रत्नाकर पौंड्रिक के नाम से प्रसिद्ध हुए।
सवाई जयसिंह के गुरु थे रत्नाकर पौंड्रिक
रत्नाकर पौंड्रिक और सवाई जयसिंह का संबंध केवल राजा और राजपुरोहित तक सीमित नहीं माना जाता। ऐतिहासिक साहित्य में उन्हें सवाई जयसिंह का गुरु भी बताया गया है।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जयसिंह के दरबार में उनका कितना महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा।
जिस दौर में सवाई जयसिंह आमेर और बाद में जयपुर को खगोल विज्ञान, वास्तुकला, संस्कृत अध्ययन और वैदिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र बना रहे थे, उसी दौर में रत्नाकर पौंड्रिक उनके धार्मिक और विद्वत् मंडल के प्रमुख व्यक्तियों में शामिल थे।
जयपुर की स्थापना से भी जुड़ता है पौंड्रिक जी का नाम
सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1727 ईस्वी में जयपुर की स्थापना की। रत्नाकर पौंड्रिक उस समय तक महाराजा के अत्यंत करीबी धार्मिक विद्वान और राजपुरोहित बन चुके थे।
जयपुर की स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं और उपलब्ध विवरणों में शहर की स्थापना से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों में भी पौंड्रिक जी की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।
महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा किए गए बड़े वैदिक अनुष्ठानों और यज्ञों के संदर्भ में भी रत्नाकर पौंड्रिक का नाम सामने आता है। विशेष रूप से जयसिंह के अश्वमेध यज्ञ से संबंधित ऐतिहासिक अध्ययनों में पौंड्रिक और उनके विद्वत् परिवार का उल्लेख मिलता है।
इसलिए रत्नाकर पौंड्रिक को जयपुर के शुरुआती दौर की धार्मिक और वैदिक विद्वत् परंपरा के महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक माना जा सकता है।
‘जयसिंहकल्पद्रुम’ के रचयिता भी थे पौंड्रिक
रत्नाकर पौंड्रिक केवल धार्मिक अनुष्ठान कराने वाले राजपुरोहित नहीं थे, बल्कि संस्कृत और धर्मशास्त्र के विद्वान भी थे।
उनसे जुड़ा महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘जयसिंहकल्पद्रुम’ है, जिसके रचयिता रत्नाकर भट्ट माने जाते हैं। इस ग्रंथ में धर्मशास्त्र, व्रत, दान, श्राद्ध और धार्मिक कर्मकांड जैसे विषयों का विवेचन मिलता है।
दिलचस्प बात यह है कि इस ग्रंथ का संबंध 1713 ईस्वी तक मिलता है। यानी रत्नाकर पौंड्रिक का सवाई जयसिंह से संबंध जयपुर शहर की स्थापना से काफी पहले का था।
ब्रह्मपुरी में आज भी मौजूद है पौंड्रिक जी की विरासत
जयपुर बसाने के बाद सवाई जयसिंह ने विद्वानों और राजदरबार से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों को नए शहर में बसाया। इसी क्रम में ब्रह्मपुरी क्षेत्र में रत्नाकर पौंड्रिक से जुड़ी हवेली भी स्थापित हुई।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भी पुष्टि करता है कि ब्रह्मपुरी स्थित रत्नाकर पौंड्रिक जी की हवेली 18वीं शताब्दी (सन् 1743) में महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा बनवाई गई थी।
बताया जाता है की यह हवेली लगभग 2,600 गज के विशाल क्षेत्र में फैली हुई है और ब्रह्मपुरी की सबसे प्राचीन तथा महत्वपूर्ण हवेलियों में से एक है। नगर निगम की अनदेखी की वजह से अब यह हवेली नष्ट होने की कगार पर है।
यह तथ्य बताता है कि महाराजा के दरबार में पौंड्रिक जी को कितना महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।
सागर में पौंड्रिक गुरु चरण मंदिर
रत्नाकर पौंड्रिक की स्मृति केवल पुराने जयपुर शहर तक सीमित नहीं है। जयपुर के सागर झील क्षेत्र में भी उनसे जुड़ा एक स्थान बताया जाता है, जिसे पौंड्रिक गुरु चरण मंदिर (Poundrik Guru Charan Mandir) कहा जाता है।
सागर क्षेत्र में आगे बढ़ने पर छोटे सागर की पाल के बीच एक दो मंजिला निर्माण दिखाई देता है। इसके निचले हिस्से में एक कमरा और सामने बरामदा है, जबकि ऊपर एक सुंदर बारादरी बनी हुई है।
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पाल के दोनों तरफ बनी सीढ़ियों से ऊपर बारादरी तक पहुंचा जा सकता है, जहां से छोटा और बड़ा सागर दोनों दिखाई देते हैं।
स्थानीय जानकारी के अनुसार नीचे स्थित कमरे में सवाई जयसिंह द्वितीय के गुरु रत्नाकर पौंड्रिक के चरण स्थापित हैं, इसलिए इसे पौंड्रिक गुरु चरण मंदिर कहा जाता है।
इसके पास कुछ नीचे की ओर एक चबूतरे पर पत्थर का स्तंभ भी दिखाई देता है। स्थानीय स्तर पर इसे पौंड्रिक जी की समाधि अथवा उनसे जुड़ा स्मृति-स्थल बताया जाता है, हालांकि इसकी निश्चित ऐतिहासिक पहचान के लिए ठोस दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
इसी प्रकार इस गुरु चरण मंदिर के निर्माण का समय 1777 ईस्वी बताया जाता है। फिलहाल इस तिथि की स्वतंत्र प्रामाणिक पुष्टि नहीं मिलती, इसलिए इसे स्थानीय रूप से प्रचलित जानकारी के रूप में समझना उचित होगा।
क्या तालकटोरा का पौंड्रिक पार्क भी रत्नाकर पौंड्रिक से जुड़ा है?
जयपुर में पौंड्रिक नाम की एक और प्रसिद्ध जगह है—तालकटोरा के सामने स्थित पौंड्रिक पार्क।
यह पार्क ब्रह्मपुरी-तालकटोरा क्षेत्र में स्थित है और पुराने जयपुर की सांस्कृतिक परंपराओं से आज भी जुड़ा हुआ है। यहां जयपुर की प्रसिद्ध तीज और गणगौर जैसी पारंपरिक शाही सवारियों से संबंधित आयोजन होते रहे हैं।
अब सवाल उठता है कि क्या इसका नाम भी राजगुरु रत्नाकर पौंड्रिक के नाम पर पड़ा?
भौगोलिक दृष्टि से यह बात रोचक जरूर है, क्योंकि पौंड्रिक जी की ऐतिहासिक हवेली भी ब्रह्मपुरी में है और पौंड्रिक पार्क भी इसी क्षेत्र में तालकटोरा के पास स्थित है। लेकिन अभी ऐसा कोई भरोसेमंद ऐतिहासिक या सरकारी दस्तावेज नहीं मिला, जो स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित करे कि पार्क का नाम रत्नाकर पौंड्रिक के सम्मान में ही रखा गया था।
इसलिए फिलहाल इतना ही कहना उचित है कि पौंड्रिक पार्क का नाम और रत्नाकर पौंड्रिक की ब्रह्मपुरी से ऐतिहासिक संबद्धता एक दिलचस्प कड़ी जरूर प्रस्तुत करती है, लेकिन दोनों का सीधा संबंध दस्तावेजी रूप से प्रमाणित होना बाकी है।
जयपुर के इतिहास में क्यों महत्वपूर्ण हैं रत्नाकर पौंड्रिक?
रत्नाकर पौंड्रिक की कहानी वास्तव में जयपुर के निर्माणकाल की उस दुनिया की कहानी है, जिसमें राजा के साथ वास्तुकार, खगोलविद, ज्योतिषी, संस्कृत विद्वान और वैदिक आचार्य भी नए शहर की पहचान गढ़ रहे थे।
महाराष्ट्र से निकलकर काशी में उच्च अध्ययन करने वाले रत्नाकर भट्ट की विद्वत्ता ने सवाई जयसिंह को इतना प्रभावित किया कि महाराजा उन्हें अपने साथ ले आए, राजपुरोहित बनाया और ‘पौंड्रिक’ की उपाधि दी। आगे चलकर उनका नाम सवाई जयसिंह के गुरु, धर्मशास्त्र के विद्वान और वैदिक परंपरा के प्रमुख आचार्य के रूप में सामने आता है।
जयपुर की स्थापना के दौर से उनका जुड़ाव, ‘जयसिंहकल्पद्रुम’ जैसे ग्रंथ की रचना, ब्रह्मपुरी में उनकी मौजूदगी और सागर में आज भी प्रचलित पौंड्रिक गुरु चरण मंदिर उनकी स्मृति को लगभग तीन शताब्दियों बाद भी जयपुर के भूगोल से जोड़े हुए हैं।
यही कारण है कि रत्नाकर पौंड्रिक को केवल सवाई जयसिंह का राजपुरोहित कहना उनके व्यक्तित्व को पूरा नहीं बताता। वे उस विद्वत् परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसने जयपुर की स्थापना के समय इस नए शहर को धार्मिक, वैदिक और बौद्धिक पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
