भारत के चार धामों में से एक श्रीजगन्नाथ मंदिर, पुरी केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लगभग 450 वर्ष पहले यह मंदिर अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुज़रा था?
यह कहानी तीन महान शासकों की है—गजपति महाराजा मुकुंददेव, गजपति राजा रामचंद्रदेव प्रथम और आमेर के राजा मानसिंह प्रथम—जिनके योगदान ने अलग-अलग समय पर भगवान जगन्नाथ की परंपरा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1568 ईस्वी – जब ओडिशा का अंतिम स्वतंत्र गजपति पराजित हुआ
16वीं शताब्दी में ओडिशा पर गजपति महाराजा मुकुंददेव का शासन था। वे 1559 से 1568 ईस्वी तक शासन करने वाले ओडिशा के अंतिम स्वतंत्र गजपति शासक माने जाते हैं।
मुकुंददेव ने बंगाल सल्तनत के विरुद्ध संघर्ष किया और मुगल सम्राट अकबर के साथ भी राजनीतिक संबंध बनाए। लेकिन 1568 ईस्वी में बंगाल के अफ़गान शासक सुलैमान खान कर्रानी की सेना ने ओडिशा पर आक्रमण कर दिया। युद्ध के दौरान मुकुंददेव वीरगति को प्राप्त हुए और ओडिशा की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो गई।
कौन था कालापहाड़?
मुकुंददेव की पराजय के बाद बंगाल सल्तनत के अफ़गान सेनापति कालापहाड़ को पुरी भेजा गया।
इतिहासकारों के अनुसार, कालापहाड़ बंगाल के कर्रानी (Karrani) अफ़गान सल्तनत का प्रमुख सेनापति था। उसके बारे में कई लोककथाएँ प्रचलित हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इतना स्पष्ट है कि उसने 1568 ईस्वी में पुरी पर आक्रमण किया और श्रीजगन्नाथ मंदिर को भारी क्षति पहुँचाई।
जगन्नाथ मंदिर पर हमला
मंदिर के प्राचीन अभिलेख मादला पांजी के अनुसार, कालापहाड़ के आक्रमण से पहले मंदिर के सेवायत भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रहों को सुरक्षित स्थान पर ले गए।
इसके बावजूद मंदिर का खजाना लूटा गया, मंदिर को नुकसान पहुँचा और विग्रहों को नष्ट करने का प्रयास किया गया।
कहा जाता है कि भगवान के दिव्य 'ब्रह्म पदार्थ' को भक्तों ने सुरक्षित बचा लिया। कई वर्षों तक यही ब्रह्म पदार्थ गुप्त स्थान पर सुरक्षित रखा गया, जबकि मंदिर का गर्भगृह लगभग रिक्त रहा और धार्मिक परंपराएँ भी प्रभावित हुईं।
फिर इतिहास में आए राजा रामचंद्रदेव प्रथम
कालापहाड़ के आक्रमण के बाद ओडिशा कठिन दौर से गुजर रहा था।
इसी समय राजा रामचंद्रदेव प्रथम ने खुर्दा (खुरदा) राज्य की स्थापना की। उन्हें भोंई (Bhoi) वंश का संस्थापक और आधुनिक ओडिशा के पुनर्निर्माताओं में से एक माना जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार, उन्होंने भगवान जगन्नाथ की पूजा-पद्धति को पुनः व्यवस्थित कराया, नए विग्रहों की प्रतिष्ठा करवाई और पुरी मंदिर की धार्मिक व्यवस्था को दोबारा स्थापित किया। इसी कारण उन्हें कई स्थानों पर 'अभिनव इन्द्रद्युम्न' भी कहा जाता है।
लेकिन राजनीतिक संकट अभी समाप्त नहीं हुआ था
यद्यपि पूजा-पद्धति पुनः शुरू हो चुकी थी, लेकिन अफ़गान शक्तियाँ अभी भी ओडिशा में सक्रिय थीं।
कुतलू खाँ लोहानी और बाद में उसके उत्तराधिकारी नासिर खाँ ने फिर से पुरी क्षेत्र पर अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया।
ऐसी स्थिति में मंदिर की सुरक्षा और स्थायी संरक्षण अभी भी चुनौती बनी हुई थी।
तब आए आमेर के राजा मानसिंह प्रथम
सम्राट अकबर ने अपने सबसे विश्वसनीय सेनापतियों में से एक आमेर (वर्तमान जयपुर) के राजा मानसिंह प्रथम को उड़ीसा अभियान की जिम्मेदारी सौंपी।
1590 से 1592-93 ईस्वी के बीच राजा मानसिंह ने अफ़गान सेनाओं के विरुद्ध निर्णायक अभियान चलाया।
नासिर खाँ की पराजय के बाद ओडिशा पर मुगल प्रशासन की स्थायी व्यवस्था स्थापित हुई और पुरी सहित पूरा क्षेत्र राजनीतिक रूप से स्थिर हुआ।
मंदिर को मिला स्थायी संरक्षण
इतिहासकारों का मानना है कि राजा रामचंद्रदेव प्रथम ने धार्मिक पुनर्स्थापना की, जबकि राजा मानसिंह प्रथम ने राजनीतिक स्थिरता प्रदान की।
इन दोनों प्रयासों के कारण श्रीजगन्नाथ मंदिर की अखंड पूजा-पद्धति सुरक्षित रह सकी और आने वाली सदियों तक रथयात्रा तथा अन्य परंपराएँ निर्बाध रूप से चलती रहीं।
आज भी जीवित है जयपुर और पुरी का संबंध
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण जयपुर और जगन्नाथ पुरी का संबंध केवल धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक भी माना जाता है।
जयपुर में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के अवसर पर शाही त्रिपोलिया गेट खोला जाता है, जो सामान्यतः केवल राजपरिवार के लिए आरक्षित रहता है। यह परंपरा उस ऐतिहासिक संबंध की प्रतीक मानी जाती है, जिसकी जड़ें लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पुरानी हैं।
निष्कर्ष
श्रीजगन्नाथ मंदिर का इतिहास किसी एक राजा या एक घटना की कहानी नहीं है।
- महाराजा मुकुंददेव ने अंतिम स्वतंत्र गजपति के रूप में ओडिशा की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
- राजा रामचंद्रदेव प्रथम ने भगवान जगन्नाथ की पूजा और मंदिर व्यवस्था को पुनर्जीवित किया।
- राजा मानसिंह प्रथम ने राजनीतिक स्थिरता स्थापित कर मंदिर को दीर्घकालिक संरक्षण मिलने का मार्ग प्रशस्त किया।
इसीलिए श्रीजगन्नाथ मंदिर आज केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की अदम्य आस्था, संघर्ष और पुनर्जागरण का अमर प्रतीक माना जाता है।
