Eklingji Temple Udaipur, इसमें मेवाड़ के आराध्य देव एकलिंगजी मंदिर के इतिहास, वास्तुकला और महत्व के बारे में जानकारी दी गई है।
राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित श्री एकलिंगजी मंदिर न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि यह मेवाड़ राजवंश और स्थानीय लोगों की अटूट आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है।
दो पहाड़ियों के बीच बसे कैलाशपुरी में स्थित यह भव्य शिव धाम अपनी अनूठी परंपराओं और बेजोड़ स्थापत्य कला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।
1. भौगोलिक स्थिति और प्रबंधन
स्थिति: यह प्राचीन मंदिर उदयपुर शहर से लगभग 22 किलोमीटर उत्तर में नेशनल हाईवे-48 (NH-48) पर कैलाशपुरी (एकलिंगपुरा) में स्थित है। प्रसिद्ध धार्मिक स्थल नाथद्वारा से इसकी दूरी लगभग 26 किलोमीटर है।
प्रबंधन: यह मंदिर 'श्री एकलिंगजी ट्रस्ट, सिटी पैलेस, उदयपुर' के अंतर्गत आता है।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: एकलिंगजी के उदयपुर (कैलाशपुरी) आने की कथा
दैनिक भास्कर की प्रामाणिक रिपोर्ट के अनुसार, एकलिंगनाथ महादेव का इतिहास वागड़ क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। उन्हें उदयपुर लाए जाने की कहानी इस प्रकार है:
मूल स्थान (बड़ौदा/गड़ा एकलिंगजी): करीब 400 साल पहले उपखंड मुख्यालय से 3 किमी दूर 'बड़ौदा' एक समृद्ध 'वटप्रद नगरी' हुआ करती थी, जो चार वादियों में बंटी थी। इसमें वर्तमान गड़ा एकलिंगजी का क्षेत्र 'केदार वाड़ी' के नाम से प्रख्यात था।
मुगल आक्रमण: वटप्रद नगरी बड़ौदा पर एक मुगल शासक ने आक्रमण कर दिया और पूरी नगरी को तहस-नहस कर दिया।
उदयपुर के महाराणा को स्वप्न: इस भीषण आक्रमण के बाद, उदयपुर के महाराणा को सपने में स्वयं भगवान शिव ने दर्शन दिए। भगवान शिव ने सपने में कहा कि "मैं वागड़ की धरा पर सुरक्षित नहीं हूँ। मुझे यहाँ से कहीं और स्थापित किया जाए।"
स्थापना और नया स्वरूप: भगवान के इस आदेश पर उदयपुर के महाराणा ने वर्तमान स्थान (एकलिंगपुरा/कैलाशपुरी) में भव्य शिव मंदिर की स्थापना की और मूर्ति को यहाँ सुरक्षित लाकर प्रतिष्ठित किया।
मूल स्थान की स्थिति: मूर्ति के उदयपुर चले जाने के बाद गड़ा एकलिंगजी में बना पुराना महादेव मंदिर खंडहर हो गया। बाद में डूंगरपुर के महा रावल को गड़ा एकलिंगजी में स्थापित महादेव की सुध आई, तो उन्होंने पूजा का जिम्मा देव सोमनाथ के पुजारी को दिया।
3. समय-समय पर पुनर्निर्माण और विकास
मूल ऐतिहासिक नींव (8वीं शताब्दी): हालांकि कथाओं में 400 साल पहले के विस्थापन का जिक्र है, लेकिन इतिहास के अनुसार इस स्थान की मूल नींव 8वीं शताब्दी (734 ईस्वी) में मेवाड़ के संस्थापक बापा रावल के समय ही पड़ गई थी।
पुनर्निर्माण: बाहरी आक्रांताओं द्वारा समय-समय पर किए गए नुकसान के बाद महाराणा मोकल द्वारा मंदिर का पुनर्निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया गया था।
वर्तमान स्वरूप (15वीं शताब्दी): मंदिर के दक्षिण द्वार पर लगी प्रशस्ति (शिलालेख) के अनुसार, मंदिर को इसका वर्तमान भव्य स्वरूप महाराणा रायमल (शासनकाल: 1473–1509 ईस्वी) द्वारा प्रदान किया गया।
4. अद्भुत चतुर्मुख शिवलिंग और मुख्य गर्भगृह
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका चतुर्मुख (चार मुखों वाला) शिवलिंग है, जो आंतरिक गर्भगृह में स्थापित है।
निर्माण: यह अत्यंत आकर्षक शिवलिंग श्याम संगमरमर (Black Marble) से निर्मित है, जिसे 15वीं शताब्दी के अंत में महाराणा रायमल द्वारा स्थापित किया गया था।
चार चेहरों का आध्यात्मिक महत्व: शिवलिंग के ये चार चेहरे भगवान शिव के चार अलग-अलग रूपों और अन्य देवताओं के प्रतीक माने जाते हैं:
उत्तर की तरफ का चेहरा: भगवान विष्णु का स्वरूप
पूर्व की तरफ का चेहरा: भगवान सूर्य का स्वरूप
पश्चिम की तरफ का चेहरा: भगवान ब्रह्मा का स्वरूप
दक्षिण की तरफ का चेहरा: भगवान रुद्र (शिव) का स्वरूप
विशेष नियम: मुख्य मंदिर के कटघरे (railings) के भीतर आम दर्शनार्थियों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है। श्रद्धालु बाहर से ही दर्शन लाभ ले सकते हैं।
5. मंदिर की वास्तुकला और परिसर
शिल्प और वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर बेजोड़ है:
परकोटा: यह भव्य मंदिर चारों ओर से ऊंचे और मजबूत परकोटों (सुरक्षा दीवारों) से घिरा हुआ है।
108 मंदिर: मुख्य मंदिर के चारों ओर परिसर के भीतर ही देवी-देवताओं के 108 छोटे-छोटे मंदिर बने हुए हैं, जिनके बिल्कुल बीचों-बीच मुख्य एकलिंगजी का मंदिर स्थित है।
शिव परिवार और नंदी: मुख्य मंदिर में पूरे शिव परिवार की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मुख्य द्वार पर भगवान शिव के वाहन नंदी की एक विशाल पीतल की प्रतिमा भी स्थापित है।
साहित्यिक प्रमाण: इस मंदिर की महिमा का वर्णन महाराणा कुंभा द्वारा रचित 'एकलिंग महात्म्य' और महाराणा रायमल के काल में रचे गए 'एकलिंग पुराण' में विस्तार से मिलता है।
6. मेवाड़ राजवंश और एकलिंगजी का संबंध
मेवाड़ के इतिहास की यह सबसे अनूठी परंपरा है कि यहाँ के शासक स्वयं को राजा नहीं मानते थे।
भगवान एकलिंगनाथ को ही मेवाड़ का वास्तविक राजा (शासक) माना जाता है।
मेवाड़ के महाराणा स्वयं को उनका 'दीवान' या प्रतिनिधि मानकर उनके नाम से शासन चलाया करते थे। इसी कारण एकलिंगजी मेवाड़ के शासकों के इष्टदेव और आराध्य देव हैं।
7. उत्सव और यात्रा सुगमता
महाशिवरात्रि मेला: यहाँ हर साल महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर एक बहुत बड़ा मेला लगता है। इस दौरान अंचल भर से श्रद्धालु सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा (पैदल यात्रा) करके बाबा के दर्शन के लिए पहुँचते हैं।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer)
इस लेख में शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। आलेख की जानकारी को पाठक महज सूचना के तहत ही लें क्योंकि इसे आपको केवल जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।
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Tourism

