भारत की संस्कृति में भगवान केवल पूजा की मूर्ति नहीं हैं, बल्कि उन्हें परिवार के सदस्य की तरह माना जाता है। यही कारण है कि ओडिशा के पुरी स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ भी वही व्यवहार किया जाता है जो एक जीवित मनुष्य के साथ किया जाता है। वे स्नान करते हैं, भोजन करते हैं, विश्राम करते हैं और आश्चर्य की बात यह है कि हर वर्ष बीमार भी पड़ते हैं।
सुनने में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। भगवान के बीमार होने के बाद उनका आयुर्वेदिक उपचार किया जाता है और पूरे 15 दिनों तक वे एकांतवास में रहते हैं। आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी।
महास्नान से शुरू होती है पूरी परंपरा
हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन चक्र का भव्य महास्नान कराया जाता है। इसे स्नान पूर्णिमा भी कहा जाता है।
इस दिन भगवान को ठंडे और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है ताकि भीषण गर्मी से उन्हें राहत मिले। यह स्नान मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में से एक माना जाता है।
साल में केवल एक बार खुलता है 'सोने का कुआँ'
महास्नान के लिए साधारण जल का उपयोग नहीं किया जाता।
मंदिर परिसर में स्थित एक विशेष कुएँ से जल निकाला जाता है, जिसे 'सोने का कुआँ' (सुना कुआँ) कहा जाता है। मान्यता है कि मंदिर के संस्थापक राजा इंद्रद्युम्न ने इस कुएँ के भीतर सोने की ईंटें लगवाई थीं। इसी कारण इसे सोने का कुआँ कहा जाता है।
सुरक्षा के लिए इस कुएँ पर लगभग 2 टन वजनी लोहे का ढक्कन लगा रहता है। इसे पूरे वर्ष बंद रखा जाता है और सिर्फ ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ही खोला जाता है। इसी दिन यहाँ से पवित्र जल निकालकर भगवान का अभिषेक किया जाता है।
108 घड़ों के जल से होता है शाही अभिषेक
महास्नान के दौरान कुल 108 घड़ों के पवित्र जल का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक देवता के लिए घड़ों की संख्या पहले से निर्धारित है।
सुदर्शन जी – 18 घड़े
बलभद्र जी – 33 घड़े
देवी सुभद्रा – 22 घड़े
भगवान जगन्नाथ – 35 घड़े
इस प्रकार कुल 108 घड़ों से अभिषेक सम्पन्न होता है।
आखिर भगवान बीमार क्यों पड़ते हैं?
मान्यता है कि भीषण गर्मी के बीच जब भगवान को 108 घड़ों के ठंडे जल से स्नान कराया जाता है, तो उन्हें ज्वर (बुखार) हो जाता है।
यही कारण है कि स्नान के बाद भगवान सार्वजनिक दर्शन नहीं देते। इस अवधि को 'अनावसार काल' या 'अनसर' कहा जाता है।
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यह लगभग 15 दिनों तक चलता है। इस दौरान भगवान विश्राम करते हैं और भक्त उनके प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर पाते।
भगवान का भी होता है इलाज
भगवान को मंदिर के एक विशेष एकांत कक्ष में विराजमान किया जाता है। परंपरा के अनुसार राजवैद्य उनकी सेवा और उपचार करते हैं।
इस दौरान भगवान को सामान्य भोग नहीं लगाया जाता। उन्हें हल्का और स्वास्थ्यवर्धक भोजन तथा आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से तैयार विशेष औषधियाँ और पाचक पदार्थ अर्पित किए जाते हैं।
यह परंपरा इस संदेश को भी देती है कि बीमारी आने पर आराम और उचित उपचार कितना आवश्यक है।
15 दिनों तक मंदिर में बदल जाता है माहौल
भगवान के विश्राम में कोई बाधा न आए, इसलिए मंदिर में कई विशेष नियम लागू किए जाते हैं।
मंदिर परिसर में घंटियाँ और वाद्य यंत्र नहीं बजाए जाते।
किसी प्रकार का निर्माण या मरम्मत कार्य नहीं होता।
वातावरण शांत रखा जाता है ताकि भगवान आराम कर सकें।
यह सब भगवान के प्रति श्रद्धा और सेवा का प्रतीक माना जाता है।
तब भक्त किसके दर्शन करते हैं?
जब भगवान एकांतवास में होते हैं, तब भक्तों को निराश नहीं लौटाया जाता।
इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के पटचित्र (कपड़े पर बनी पारंपरिक चित्रकला) स्थापित की जाती है। श्रद्धालु इन्हीं दिव्य चित्रों के दर्शन और पूजा करते हैं।
ओडिशा की प्रसिद्ध पटचित्र कला का यह धार्मिक महत्व भी इसी परंपरा से जुड़ा हुआ है।
फिर आता है 'नवयौवन दर्शन'
लगभग 15 दिनों के उपचार और विश्राम के बाद भगवान पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने नए और अत्यंत मनोहारी स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसे 'नवयौवन दर्शन' कहा जाता है।
मान्यता है कि इस समय भगवान का तेज और सौंदर्य पहले से भी अधिक दिव्य दिखाई देता है। लाखों श्रद्धालु इस दर्शन के लिए दूर-दूर से पुरी पहुँचते हैं।
इसके बाद निकलती है विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा
नवयौवन दर्शन के तुरंत बाद भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विशाल रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं।
पुरी की यह जगन्नाथ रथयात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
इस परंपरा का आध्यात्मिक संदेश
भगवान जगन्नाथ की यह अनूठी परंपरा हमें एक गहरा संदेश देती है। यहाँ भगवान को केवल देवता नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह माना जाता है। वे भी स्नान करते हैं, बीमार पड़ते हैं, उपचार करवाते हैं, विश्राम करते हैं और फिर स्वस्थ होकर भक्तों के बीच लौटते हैं।
यही आत्मीयता और मानवीय भाव श्री जगन्नाथ संस्कृति को पूरी दुनिया में अद्वितीय बनाते हैं। शायद यही कारण है कि पुरी की यह हजारों वर्षों पुरानी परंपरा आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।
