मेवाड़ की धरती केवल अपने दुर्गों, राजमहलों और युद्धों के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां ऐसे अनेक धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं जो इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों से जुड़े हुए हैं।
आवड़ सावड़ के पहाड़ों में बीच रणकपुर की नाल में स्थित सेजिया महादेव मंदिर ऐसा ही एक प्राचीन शिवालय है, जिसका संबंध केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं बल्कि मेवाड़ और मुगलों के बीच हुए संघर्षों से भी जोड़ा जाता है।
स्थानीय परंपराओं और ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार यह मंदिर उस दौर का साक्षी माना जाता है, जब मेवाड़ अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रहा था और अरावली की घाटियां युद्ध के रणक्षेत्र बनी हुई थीं। विशेष रूप से 1611 ईस्वी में रणकपुर क्षेत्र में हुए युद्ध की एक महत्वपूर्ण घटना इस मंदिर से जुड़ी हुई मानी जाती है।
झाला वीरों की पीढ़ियों से जुड़ा इतिहास
सेजिया महादेव मंदिर के इतिहास को समझने के लिए देलवाड़ा के झाला शासकों की पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है।
देलवाड़ा के शासक राजराणा जेत्र सिंह झाला ने 1567-68 ईस्वी में अकबर के चित्तौड़गढ़ आक्रमण के समय मेवाड़ की ओर से युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। उनके बाद उनके पुत्र राजराणा मानसिंह झाला देलवाड़ा के शासक बने।
मानसिंह झाला ने भी अपने पिता की तरह मेवाड़ के प्रति निष्ठा बनाए रखी और 1576 ईस्वी के प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की ओर से लड़ते हुए शहीद हो गए। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र शत्रुशाल सिंह झाला देलवाड़ा के जागीरदार बने।
यही शत्रुशाल सिंह और उनके भाई कल्याण सिंह झाला आगे चलकर सेजिया महादेव मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक कथा के प्रमुख पात्र बनते हैं।
रणकपुर की घाटियों में छिड़ा भीषण युद्ध
सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में मेवाड़ और मुगलों के बीच संघर्ष पुनः तेज हो गया। 1611 ईस्वी में रणकपुर क्षेत्र की घाटियों में एक महत्वपूर्ण युद्ध हुआ।
इस युद्ध में मेवाड़ की ओर से नेतृत्व देवगढ़ के रावत दूदा सिंह चूंडावत कर रहे थे, जबकि मुगल सेना का नेतृत्व सेनापति अब्दुल्ला खान के हाथों में था। रणकपुर की दुर्गम पहाड़ियां, संकरी घाटियां और घने वन इस युद्ध के प्रमुख क्षेत्र बने।
See also आवड़-सावड़ की पहाड़ियों में हुआ रणकपुर युद्ध - Ranapur Battle in Ranakpur Ki Naal
युद्ध अत्यंत भीषण था। मेवाड़ के अनेक वीर सरदारों ने इसमें अपने प्राण न्योछावर कर दिए। रावत दूदा सिंह चूंडावत, झाला देदा सहित कई योद्धा रणभूमि में शहीद हुए।
बड़ी सादड़ी के झाला देदा की स्मृति में रणकपुर घाटी में उनकी छतरी का निर्माण भी किया गया, जिसे आज भी उनकी वीरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
जब रणकपुर युद्ध का संबंध सेजिया महादेव से जुड़ा
इसी युद्ध में देलवाड़ा के शासक शत्रुशाल सिंह झाला भी सम्मिलित थे। उन्होंने मुगल सेना के विरुद्ध बहादुरी से युद्ध किया, लेकिन संघर्ष के दौरान उन्हें अनेक गंभीर घाव लगे और वे रणभूमि में मूर्छित होकर गिर पड़े।
अपने बड़े भाई की स्थिति का समाचार मिलने पर कल्याण सिंह झाला ने युद्ध का मोर्चा संभाला। परंपराओं के अनुसार वे युद्ध क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर में पहुंचे, जिसे आज सेजिया महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।
यहीं से इस मंदिर का इतिहास रणकपुर युद्ध की घटनाओं से जुड़ जाता है।
मंदिर बना प्रतिरोध का केंद्र
कहा जाता है कि कल्याण सिंह ने मंदिर और उसके आसपास की पहाड़ी स्थिति का लाभ उठाकर मुगल सैनिकों का सामना किया। उनके पास तीर-कमान थे और उन्होंने मंदिर परिसर के निकट से शाही सेना पर लगातार प्रहार किए।
लोककथाओं में वर्णित है कि उन्होंने अकेले ही बड़ी संख्या में मुगल सैनिकों को मार गिराया। उनका उद्देश्य केवल युद्ध करना नहीं था, बल्कि अपने घायल भाई शत्रुशाल सिंह की रक्षा करना भी था ताकि उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का अवसर मिल सके।
इस प्रकार सेजिया महादेव मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं रहा, बल्कि संकट की उस घड़ी में मेवाड़ के प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
वीरता की वह घटना जिसने मंदिर को इतिहास में स्थान दिलाया
कल्याण सिंह लंबे समय तक युद्ध करते रहे। अंततः उनके तीर समाप्त हो गए और वे स्वयं भी गंभीर रूप से घायल हो गए। लगातार संघर्ष के कारण वे मूर्छित होकर गिर पड़े।
जब मुगल सैनिकों ने उन्हें घेर लिया, तब उनकी असाधारण वीरता को देखकर मुगल सेनापति अब्दुल्ला खान भी प्रभावित हो गया। परंपराओं के अनुसार उसने कल्याण सिंह का सम्मान किया और सम्मानपूर्वक शाहजादा खुर्रम के पास भेजा।
उधर शत्रुशाल सिंह घायल अवस्था में रणक्षेत्र से निकलकर रावल्या (गोगुंदा) क्षेत्र की ओर पहुंचने में सफल रहे। इन घटनाओं ने सेजिया महादेव मंदिर को मेवाड़ के वीरता-इतिहास से स्थायी रूप से जोड़ दिया।
केवल धार्मिक नहीं, ऐतिहासिक धरोहर भी
आज सेजिया महादेव मंदिर श्रद्धालुओं के लिए भगवान शिव की आराधना का प्रमुख स्थान है, लेकिन इसकी पहचान केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है।
यह मंदिर उस कालखंड की याद दिलाता है जब मेवाड़ के सरदार अरावली की घाटियों में मुगल साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। यहां से जुड़ी कल्याण सिंह झाला की कथा इस स्थान को विशेष ऐतिहासिक महत्व प्रदान करती है।
संभवतः यही कारण है कि स्थानीय लोकस्मृतियों में यह मंदिर केवल शिवभक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि वीरता, त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक भी माना जाता है।
निष्कर्ष
सेजिया महादेव मंदिर का महत्व उसके प्राचीन धार्मिक स्वरूप से कहीं अधिक व्यापक है। यह मंदिर मेवाड़ के संघर्षपूर्ण इतिहास, रणकपुर की घाटियों में हुए युद्ध और देलवाड़ा के झाला वीरों की स्मृतियों से जुड़ा हुआ है।
राजराणा जेत्र सिंह के चित्तौड़ बलिदान से लेकर हल्दीघाटी में राजराणा मानसिंह की शहादत और फिर रणकपुर युद्ध में शत्रुशाल सिंह तथा कल्याण सिंह की वीरता तक, यह पूरा घटनाक्रम सेजिया महादेव मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को गौरवपूर्ण बनाता है।
इसी कारण सेजिया महादेव मंदिर केवल एक प्राचीन शिवालय नहीं, बल्कि मेवाड़ की वीरता, संघर्ष और स्वाभिमान की जीवित स्मृति के रूप में भी देखा जाता है।
