उदयपुर का गुलाब बाग केवल हरियाली, फूलों और प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र नहीं है, बल्कि यह मेवाड़ के बौद्धिक, सांस्कृतिक और वैचारिक इतिहास का भी महत्वपूर्ण अध्याय समेटे हुए है। यदि गुलाब बाग को केवल एक उद्यान मान लिया जाए, तो उसके वास्तविक महत्व को समझना संभव नहीं होगा।
इस विशाल परिसर के भीतर स्थित नवलखा महल, विक्टोरिया हॉल संग्रहालय, राजकीय सरस्वती पुस्तकालय, महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा, धार्मिक स्थल, समाधियां और लोटन मगरी जैसी धरोहरें इसे उदयपुर के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिसरों में शामिल करती हैं।
गुलाब बाग का यह भाग हमें उस दौर में ले जाता है जब मेवाड़ केवल एक रियासत नहीं था, बल्कि शिक्षा, समाज सुधार, इतिहास संरक्षण और सांस्कृतिक जागरण का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा था।
नवलखा महल: गुलाब बाग का हृदय स्थल
गुलाब बाग के मध्य भाग में स्थित नवलखा महल इस पूरे परिसर की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। इसे गुलाब बाग का हृदय स्थल कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
उन्नीसवीं शताब्दी में इसका निर्माण मेवाड़ के महाराणा सज्जन सिंह द्वारा करवाया गया था। प्रारंभ में यह भवन महाराणा का अतिथि गृह (गेस्ट हाउस) था, जहां विशेष अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था की जाती थी।
वास्तुकला की दृष्टि से यह भवन उस दौर की राजपूत और औपनिवेशिक स्थापत्य शैली के प्रभावों को दर्शाता है। गुलाब बाग के मध्य स्थित होने के कारण यह पूरे परिसर का प्रमुख केंद्र माना जाता था।
समय के साथ नवलखा महल का महत्व केवल एक राजकीय भवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय समाज सुधार आंदोलन और वैदिक पुनर्जागरण का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
स्वामी दयानंद सरस्वती का ऐतिहासिक प्रवास
नवलखा महल का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती से जुड़ा हुआ है।
1882 में स्वामी दयानंद सरस्वती उदयपुर आए और लगभग साढ़े छह महीने तक नवलखा महल में रहे। यह वही समय था जब वे भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों और सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष कर रहे थे।
उदयपुर प्रवास के दौरान उन्हें मेवाड़ दरबार का संरक्षण प्राप्त था और महाराणा सज्जन सिंह स्वयं उनके विचारों से प्रभावित थे।
इसी नवलखा महल में रहते हुए स्वामी दयानंद ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ "सत्यार्थ प्रकाश" के संशोधित संस्करण पर कार्य किया। यह ग्रंथ आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली वैचारिक और समाज सुधार संबंधी ग्रंथों में गिना जाता है।
यही कारण है कि नवलखा महल केवल एक ऐतिहासिक भवन नहीं, बल्कि भारतीय नवजागरण और वैदिक पुनरुत्थान की स्मृतियों से जुड़ा हुआ स्थान भी है।
आर्य समाज के लिए तीर्थस्थल
स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रवास के कारण नवलखा महल आर्य समाज के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल माना जाता है।
वर्ष 1992 में इस भवन को सांस्कृतिक स्मारक के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास प्रारंभ किए गए। इसके बाद यहां वैदिक संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा और समाज सुधार से संबंधित गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिशें हुईं।
आज भी देशभर से आर्य समाज से जुड़े लोग नवलखा महल को श्रद्धा और सम्मान के साथ देखते हैं।
धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में गुलाब बाग
गुलाब बाग केवल ऐतिहासिक और प्राकृतिक महत्व का स्थान नहीं है, बल्कि यह धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
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उद्यान परिसर में कई छोटे-बड़े मंदिर स्थित हैं, जो वर्षों से स्थानीय श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। परिसर में इमली वाले बाबा की दरगाह भी है।
नवलखा हनुमान मंदिर
नवलखा महल के निकट स्थित नवलखा हनुमान मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। हनुमान मंदिर से सटा हुआ राधा-कृष्ण मंदिर भी है।
परमहंस हनुमान मंदिर
गुलाब बाग के भीतर कमल तलाई के पास स्थित प्राचीन परमहंस हनुमान मंदिर अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध है, लेकिन स्थानीय लोगों की गहरी आस्था इससे जुड़ी हुई है। यह मंदिर उद्यान के शांत वातावरण के बीच स्थित होने के कारण विशेष आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।
इमली वाले बाबा की दरगाह
गुलाब बाग में हजरत शाह सैयद अब्दुल शकूर साबिर अली चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहे (इमली वाले बाबा) की दरगाह भी है जिसमें सभी धर्मों के अनुयायी आते हैं।
समाधि स्थल और ऐतिहासिक छतरी
गुलाब बाग परिसर में परमहंस हनुमान मंदिर से थोड़ी दूरी पर एक ऐतिहासिक समाधि स्थल भी स्थित है।
इस स्थान पर एक सुंदर छतरी निर्मित है, जिसके भीतर एक स्मारक स्तंभ स्थापित किया गया है। स्तम्भ के समीप स्थित शिवलिंग इस स्थल को धार्मिक महत्व प्रदान करता है।
हालांकि इस स्थल के बारे में विस्तृत ऐतिहासिक अभिलेख सीमित हैं, फिर भी स्थानीय स्तर पर इसे सम्मान और श्रद्धा के साथ देखा जाता है।
यह स्थान गुलाब बाग के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को और अधिक गहरा बनाता है।
लोटन मगरी की रोचक लोककथा
गुलाब बाग के पिछले भाग में स्थित एक छोटी ऊंचाई वाली पहाड़ी को लोटन मगरी कहा जाता है।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार किसी संत का इस स्थान से विशेष संबंध था। कहा जाता है कि वे इस पहाड़ी से लोटते हुए नीचे आते थे, जिसके कारण इस स्थान का नाम "लोटन मगरी" पड़ गया।
आज यहां उस संत की स्मृति से जुड़ा एक समाधि स्थल भी बताया जाता है। हालांकि इस कथा के ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, लेकिन यह लोक परंपरा उदयपुर की सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विक्टोरिया हॉल: मेवाड़ का आधुनिक संग्रहालय
गुलाब बाग के इतिहास का दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय विक्टोरिया हॉल से जुड़ा हुआ है।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में महारानी विक्टोरिया के शासन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर गुलाब बाग परिसर में एक भव्य भवन का निर्माण करवाया गया। यह भवन बाद में विक्टोरिया हॉल के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
1 नवंबर 1890 को यहां संग्रहालय आम जनता के लिए खोल दिया गया। उस समय यह राजस्थान के प्रारंभिक और महत्वपूर्ण संग्रहालयों में गिना जाता था।
गौरीशंकर हीराचंद ओझा और संग्रहालय
विक्टोरिया हॉल संग्रहालय के प्रथम क्यूरेटर राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा नियुक्त किए गए थे।
ओझा ने राजस्थान के इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके नेतृत्व में संग्रहालय को व्यवस्थित रूप से विकसित किया गया।
यह संग्रहालय केवल वस्तुओं का भंडार नहीं था, बल्कि इतिहास, पुरातत्व और सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन का केंद्र भी था।
दुर्लभ संग्रह और शिलालेख
विक्टोरिया हॉल संग्रहालय में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर आधुनिक काल तक के अनेक शिलालेख, मूर्तियां, पुरावशेष, राजसी उपयोग की वस्तुएं और दुर्लभ ऐतिहासिक सामग्री संरक्षित की गई थी।
यह संग्रह मेवाड़ और राजस्थान के इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता था। उदयपुर आने वाले विद्वान, इतिहासकार और शोधार्थी यहां अध्ययन करने के लिए आते थे।
सरस्वती पुस्तकालय: ज्ञान का भंडार
वर्ष 1968 में संग्रहालय को सिटी पैलेस परिसर में स्थानांतरित कर दिया गया। बाद में इसका नाम प्रताप संग्रहालय रखा गया।
संग्रहालय के स्थानांतरण के बाद विक्टोरिया हॉल भवन को राजकीय सरस्वती पुस्तकालय में परिवर्तित कर दिया गया।
आज यह पुस्तकालय उदयपुर के सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन केंद्रों में से एक है।
यहां इतिहास, पुरातत्व, भारतीय संस्कृति, इंडोलॉजी और प्राचीन साहित्य से संबंधित 32,000 से अधिक पुस्तकें संरक्षित हैं।
इसके अतिरिक्त यहां अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां और ऐतिहासिक दस्तावेज भी सुरक्षित रखे गए हैं।
महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा
राजकीय सरस्वती पुस्तकालय के भीतर आज भी सफेद संगमरमर से बनी महारानी विक्टोरिया की विशाल प्रतिमा सुरक्षित रखी हुई है।
यह प्रतिमा पहले विक्टोरिया हॉल भवन के बाहर स्थापित थी और उस समय मेवाड़ तथा ब्रिटिश शासन के बीच संबंधों का प्रतीक मानी जाती थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बदलते राष्ट्रीय माहौल में इस प्रतिमा को हटाकर उसके स्थान पर महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित कर दी गई।
बाद में विक्टोरिया की प्रतिमा को भवन के भीतर संरक्षित कर दिया गया, जहां वह आज भी इतिहास की एक मौन साक्षी के रूप में मौजूद है।
विक्टोरिया चरित: एक रोचक ऐतिहासिक प्रसंग
इतिहासकारों के अनुसार मेवाड़ और ब्रिटिश शासन के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के दौर में महारानी विक्टोरिया की प्रशंसा में "विक्टोरिया चरित" नामक संस्कृत ग्रंथ भी तैयार कराया गया था।
यह तथ्य उस समय के राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण माना जाता है।
निष्कर्ष
गुलाब बाग के भीतर स्थित नवलखा महल, धार्मिक स्थल, समाधियां, लोटन मगरी, विक्टोरिया हॉल और सरस्वती पुस्तकालय इस परिसर को केवल एक उद्यान नहीं रहने देते। ये सभी मिलकर इसे मेवाड़ के इतिहास, भारतीय समाज सुधार आंदोलन, वैदिक पुनर्जागरण, औपनिवेशिक काल और आधुनिक ज्ञान परंपरा का जीवंत दस्तावेज बना देते हैं।
यदि गुलाब बाग का पहला भाग हमें इसकी प्राकृतिक और पर्यावरणीय विरासत से परिचित कराता है, तो यह दूसरा भाग उसके बौद्धिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक वैभव की कहानी सुनाता है।
(क्रमशः — अगले भाग में पढ़ें: गुलाब बाग का चिड़ियाघर, राजस्थान का पहला बर्ड पार्क, महाराणा प्रताप एक्सप्रेस टॉय ट्रेन, नक्षत्र उद्यान और आधुनिक पर्यटन आकर्षण।)
