History of Jhalas in Mewar, इसमें मेवाड़ में झालाओं का आगमन और उनके बड़ी सादड़ी, देलवाड़ा और गोगुंदा जैसे प्रमुख ठिकानों के इतिहास के बारे में जानकारी है।
राजस्थान के इतिहास में झाला राजपूतों का मेवाड़ आगमन एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। मेवाड़ में झाला वंश का प्रभाव केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने राज्य की राजनीति, प्रशासन और युद्धों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मेवाड़ में झालाओं के आगमन की शुरुआत 16वीं शताब्दी के प्रारंभ में मानी जाती है।
गुजरात से मेवाड़ तक का सफर
1500 ईस्वी में हलवद (गुजरात) के झाला राजा राजोधर की मौत के बाद उनके दो पुत्र अज्जा और सज्जा ईडर होते हुए मारवाड़ पहुंचे। वहाँ उनको मंडोर के शासक ने एक जागीर दी जो झालामंड के नाम से आज भी जानी जाती है।
कुछ समय वे मंडोर में रहे, लेकिन बाद में उनका वहाँ के शासक से मतभेद हो गया जिस वजह से उन्हें 1506 ईस्वी में मारवाड़ छोड़ना पड़ा।
इसके बाद दोनों भाई अपने बहनोई महाराणा रायमल के पास मेवाड़ आए। उनकी बहन रतन कंवर का विवाह महाराणा रायमल से हुआ था। रतन कंवर से महाराणा रायमल के तीन प्रसिद्ध पुत्र हुए— पृथ्वीराज, जयमल और संग्राम सिंह (महाराणा सांगा)।
इस तरह 1506 ईस्वी में अज्जा और सज्जा का स्थायी रूप से मेवाड़ आगमन हुआ और यहीं से मेवाड़ में झाला युग की शुरुआत मानी जाती है।
महाराणा रायमल द्वारा प्रदान की गई जागीरें
मेवाड़ पहुंचने पर महाराणा रायमल ने दोनों भाइयों को सम्मानपूर्वक जागीरें प्रदान कीं।
👉 अज्जा को अजमेर क्षेत्र के निकट की जागीर प्रदान की गई।
👉 सज्जा को कैलाशपुरी के पास स्थित देलवाड़ा की जागीर दी गई।
इन्हीं जागीरों से आगे चलकर मेवाड़ में झाला ठिकानों का विस्तार हुआ।
खानवा के युद्ध में अज्जा का बलिदान
1527 ईस्वी में बाबर और महाराणा सांगा के बीच प्रसिद्ध खानवा का युद्ध हुआ। इस युद्ध में अज्जा झाला ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया। कहा जाता है कि उन्होंने युद्ध के दौरान महाराणा सांगा के प्राणों की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनकी वीरता और स्वामिभक्ति से प्रभावित होकर मेवाड़ के शासकों ने झाला परिवार को विशेष सम्मान प्रदान किया तथा "राजराणा" की उपाधि से सम्मानित किया।
अज्जा वंश के ठिकाने
खानवा युद्ध में अज्जा के शहीद होने के बाद उनके वंशजों को समय-समय पर विभिन्न जागीरें प्राप्त हुईं। बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उनके ठिकानों में परिवर्तन होता रहा।
अज्जा के वंशजों को क्रमशः—
👉 अजमेर
👉 झाड़ोल
👉 बिछीवाड़ा
👉 कानोड़
जैसी जागीरें मिलीं। अंततः बड़ी सादड़ी उनकी स्थायी जागीर बनी और यह झाला वंश का प्रमुख केंद्र बन गया।
बड़ी सादड़ी के झाला सरदारों की लगातार सात पीढ़ियों का बलिदान
बड़ी सादड़ी के झाला सरदारों की लगातार सात पीढ़ियों ने मेवाड़ के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया जो इस तरह से है-
इस वंश की पहली पीढ़ी के रूप में झाला अज्जा ने 1527 ईस्वी में बाबर से हुए खानवा के युद्ध में राणा सांगा को बचाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
दूसरी पीढ़ी के रूप में झाला अज्जा के पुत्र झाला सिंहा ने महाराणा साँगा के पुत्र महाराणा विक्रमादित्य के समय 1535 ईस्वी में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के चित्तौड़गढ़ पर किये आक्रमण के समय लड़ते हुए अपने प्राण त्यागे।
तीसरी पीढ़ी के रूप में झाला सिंहा के पुत्र झाला आसा (ओसा) ने महाराणा उदयसिंह की 1540 ईस्वी में बनवीर के साथ हुई लड़ाई में अपने प्राण त्यागे।
चौथी पीढ़ी के रूप में झाला आसा के पुत्र झाला सुरताण (सुल्तान) ने महाराणा उदयसिंह के समय में ही 1568 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर द्वारा चित्तौड़गढ़ पर किये गए आक्रमण के समय लड़ते हुए अपने प्राण त्यागे।
पाँचवीं पीढ़ी के रूप में झाला सुरताण के पुत्र झाला मान (बीदा) थे, जिन्होंने 1576 ईस्वी में हल्दीघाटी युद्ध में लड़ते हुए अपने प्राण त्यागे।
छठी पीढ़ी के रूप में झाला मान के पुत्र झाला देदा ने महाराणा अमरसिंह के समय मुगल सेना के साथ 1611 ईस्वी में हुए राणपुर (रणकपुर) के युद्ध में अपने प्राण त्यागे।
सातवीं पीढ़ी के रूप में झाला देदा के पुत्र राजराणा हरिदास (हरदास) झाला ने जहाँगीर की मुगल सेना से हुरडा गाँव के युद्ध में लड़ते हुए अपने प्राण त्यागे।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जैसे-जैसे महाराणा सांगा के बाद दूसरे महाराणा राज करने आये, वैसे-वैसे झाला परिवार में भी एक से बढ़कर एक बलिदानी तैयार होते रहे।
सज्जा और देलवाड़ा ठिकाना
अज्जा झाला के भाई सज्जा को प्राप्त देलवाड़ा ठिकाना स्थायी रूप से उनके वंश के अधीन रहा। यह ठिकाना आगे चलकर मेवाड़ के प्रमुख झाला केंद्रों में शामिल हो गया।
अज्जा की तरह सज्जा ने भी मेवाड़ की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया। 1535 ईस्वी में महाराणा विक्रमादित्य के शासनकाल में जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर दूसरा आक्रमण किया, तब सज्जा युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र जेत सिंह देलवाड़ा की गद्दी पर बैठे और झाला वंश की परंपरा को आगे बढ़ाया।
राजराणा जेत्र सिंह झाला ने 1567-68 ईस्वी में अकबर के चित्तौड़गढ़ आक्रमण के समय मेवाड़ की ओर से युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। उनके बाद उनके पुत्र राजराणा मानसिंह झाला देलवाड़ा के शासक बने।
मानसिंह झाला ने भी अपने पिता की तरह मेवाड़ के प्रति निष्ठा बनाए रखी और 1576 ईस्वी के प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की ओर से लड़ते हुए शहीद हो गए।
हल्दीघाटी के युद्ध के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र शत्रुशाल सिंह झाला देलवाड़ा के जागीरदार बने। शत्रुशाल सिंह और उनके भाई कल्याण सिंह झाला ने 1611 ईस्वी में लड़े गए रणकपुर के युद्ध में भाग लिया।
ऐसे बना गोगुंदा ठिकाना
देलवाड़ा ठिकाने से ही बाद में गोगुंदा ठिकाने का उद्भव हुआ। इस प्रकार गोगुंदा ठिकाना मूल रूप से देलवाड़ा शाखा से निकला हुआ माना जाता है।
देलवाड़ा के झाला शत्रुशाल की मृत्यु 1614 ईस्वी में वर्तमान गोगुंदा के पास रावल्या (रावलिया) गाँव में तालाब के पास हुई जहाँ उनकी समाधि बनी हुई है। महाराणा अमर सिंह ने शत्रुशाल के वंशजों को रावल्या की जागीर दी।
इस तरह शत्रुशाल के द्वितीय पुत्र कान्हसिंह (1614-1668) को रावलिया की गद्दी पर बैठाया गया।
1628 ईस्वी में कान्हसिंह ने ईडरिया राठौड़ों को हराकर गोगुंदा पर अधिकार किया। महाराणा जगत सिंह ने गोगुंदा और इसके आसपास के गाँव राजराणा कान्हसिंह को दे दिया।
गोगुंदा ठिकाने की स्थापना के बाद राजराणा कान्ह सिंह रावलिया से गोगुंदा के महलों में आ गए। इस तरह मेवाड़ में गोगुंदा के रूप में झालाओं के तीसरे ठिकाने का निर्माण हुआ।
निष्कर्ष
मेवाड़ में झाला वंश का इतिहास वीरता, निष्ठा और बलिदान की गौरवगाथा है। अज्जा और सज्जा के आगमन ने न केवल मेवाड़ में झाला शक्ति की नींव रखी, बल्कि आगे चलकर सादड़ी, देलवाड़ा और गोगुंदा जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों के विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया।
खानवा और चित्तौड़ जैसे ऐतिहासिक युद्धों में उनके बलिदान ने उन्हें मेवाड़ के इतिहास में स्थायी सम्मान दिलाया। आज भी मेवाड़ के इतिहास में अज्जा और सज्जा झाला का नाम वीरता और स्वामिभक्ति के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer)
इस लेख में शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। आलेख की जानकारी को पाठक महज सूचना के तहत ही लें क्योंकि इसे आपको केवल जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।
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