लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जिस स्वरूप के दर्शन नाथद्वारा में होते हैं, उसे यहां तक पहुंचने के लिए अनेक संकटों, युद्धों, राजनीतिक उथल-पुथल और लंबी यात्राओं से गुजरना पड़ा था।
इतिहास का एक रोचक संयोग यह भी है कि जैसे द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा पर लगातार हो रहे आक्रमणों के कारण अपना निवास स्थान बदला था, उसी प्रकार कलियुग में श्रीकृष्ण के स्वरूप श्रीनाथजी को भी बार-बार आक्रमणों और अस्थिर परिस्थितियों के कारण सुरक्षित स्थानों की ओर प्रस्थान करना पड़ा।
यह कहानी केवल एक मंदिर की नहीं, बल्कि आस्था, त्याग, राजपूती शौर्य और धर्मरक्षा की अमर गाथा है।
औरंगजेब का फरमान और संकट की शुरुआत
सन् 1669 ईस्वी में मुगल सम्राट औरंगजेब ने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने और मूर्तिपूजा पर कठोर कार्रवाई के आदेश जारी किए। उस समय ब्रजभूमि के गोवर्धन पर्वत पर भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य स्वरूप श्रीनाथजी विराजमान था।
पुष्टिमार्ग के आचार्यों और सेवायतों को स्पष्ट दिखाई देने लगा कि यदि शीघ्र कोई कदम नहीं उठाया गया तो श्रीनाथजी का विग्रह भी खतरे में पड़ सकता है। तब गोस्वामी दामोदरजी महाराज के नेतृत्व में श्रीनाथजी को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का निर्णय लिया गया।
गोवर्धन से राजस्थान तक की ऐतिहासिक यात्रा
श्रीनाथजी का रथ गोवर्धन से प्रस्थान कर आगरा, कोटा क्षेत्र, किशनगढ़, पुष्कर और मारवाड़ की ओर बढ़ा। इस यात्रा में अनेक पड़ाव आए, जो आगे चलकर चरण चौकियों के रूप में पूजित हुए।
इन चरण चौकियों का महत्व आज भी उतना ही है जितना उस समय था, क्योंकि वे श्रीनाथजी की ऐतिहासिक यात्रा की जीवित स्मृतियां हैं।
चौपासनी: जहां बन सकता था नाथद्वारा
यात्रा के दौरान श्रीनाथजी जोधपुर के निकट चौपासनी चोखा पहुंचे और लगभग छह माह तक वहीं विराजमान रहे।
यहीं श्री श्याम मनोहर प्रभु के साथ अन्नकूट उत्सव मनाए जाने का उल्लेख पुष्टिमार्गीय परंपराओं में मिलता है।
यदि उस समय जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह का अचानक निधन नहीं हुआ होता, तो संभव है कि श्रीनाथजी स्थायी रूप से मारवाड़ में ही विराजमान हो जाते और आज का नाथद्वारा जोधपुर में होता।
इसी कारण चौपासनी को आज भी "छोटा नाथद्वारा" कहा जाता है। यहां आज भी चरण चौकी और श्याम मनोहर प्रभु की सेवा पुष्टिमार्गीय परंपराओं के अनुसार होती है।
महाराणा राजसिंह और मेवाड़ का ऐतिहासिक निर्णय
जब अधिकांश शासक औरंगजेब से टकराने से बच रहे थे, तब मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने धर्मरक्षा का दायित्व स्वीकार किया।
परंपराओं के अनुसार महाराणा ने स्पष्ट संदेश दिया कि मेवाड़ में रहते हुए कोई भी श्रीनाथजी को क्षति नहीं पहुंचा सकता।
यही वह निर्णायक क्षण था जिसने मेवाड़ को श्रीनाथजी की नई कर्मभूमि बना दिया।
बैलगाड़ी का पहिया धंसा और बस गया नाथद्वारा
मेवाड़ पहुंचने पर वर्तमान नाथद्वारा के समीप सिंहाड़ (सीहाड़) गांव में एक अद्भुत घटना घटी।
कहा जाता है कि श्रीनाथजी का रथ वहीं रुक गया और आगे नहीं बढ़ा। इसे प्रभु की इच्छा माना गया। महाराणा राजसिंह ने उसी स्थान पर हवेली शैली के भव्य मंदिर के निर्माण का आदेश दिया।
फरवरी 1672 ईस्वी में प्रतिष्ठा पूर्ण हुई और यही स्थान आगे चलकर "नाथद्वारा" कहलाया — अर्थात् "नाथ का द्वार"।
See also नाथद्वारा की श्रीनाथजी हवेली - Shrinathji Mandir Nathdwara
नया संकट: मेर, पिंडारी और मराठा संघर्ष
लगभग एक शताब्दी तक नाथद्वारा सुरक्षित रहा, लेकिन अठारहवीं शताब्दी के अंत और उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में मेवाड़ फिर संकटों से घिर गया।
अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र के मेरों के आक्रमण, पिंडारियों की लूटपाट और बाद में जसवंतराव होल्कर तथा दौलतराव सिंधिया के संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया।
वि.सं. 1858 (1802 ई.) के आसपास स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि नाथद्वारा की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लग गया।
जब श्रीनाथजी ने छोड़ा नाथद्वारा
गोस्वामी तिलकायत श्री गिरधरजी महाराज ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह से परामर्श किया।
महाराणा ने तुरंत सैन्य सहायता भेजी। कोठारिया के रावत विजयसिंह चौहान सहित अनेक वीरों ने नाथद्वारा की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परंपराओं में रावत विजयसिंह के बलिदान का विशेष उल्लेख मिलता है।
अंततः निर्णय लिया गया कि श्रीनाथजी को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाए।
29 जनवरी 1802 ईस्वी के आसपास श्रीनाथजी, श्री नवनीतप्रियजी और अन्य स्वरूपों को लेकर शोभायात्रा उदयपुर की ओर रवाना हुई।
उदयपुर में प्रभु का भव्य स्वागत
उदयपुर उस समय मेवाड़ की समृद्ध राजधानी थी।
जैसे ही श्रीनाथजी के आगमन का समाचार फैला, पूरा नगर उत्सव में बदल गया। राजमार्ग सजाए गए, घरों पर तोरण बांधे गए, राजमहल और चौक-चौराहे ध्वज-पताकाओं से सुसज्जित किए गए।
महाराणा भीमसिंह स्वयं नगर के बाहर प्रभु की अगवानी के लिए उपस्थित हुए।
पुष्टिमार्गीय परंपराओं में वर्णित है कि शोभायात्रा में हाथी, घोड़े, ध्वज, नगाड़े, ब्रजवासी, मंदिर सेवक और हजारों श्रद्धालु सम्मिलित थे। नगर जयकारों और पुष्पवर्षा से गूंज उठा।
उदयपुर में श्रीनाथजी लगभग दस माह और नौ दिन तक विराजमान रहे।
घसियार: अरावली की गोद में छिपा दूसरा नाथद्वारा
उदयपुर में भी राजनीतिक संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। इसलिए एक ऐसे स्थान की आवश्यकता महसूस हुई जो प्राकृतिक रूप से सुरक्षित हो।
उदयपुर से लगभग 20–24 किलोमीटर दूर अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित घसियार को चुना गया।
See also जब नाथद्वारा में आया संकट तब बना घसियार श्रीनाथजी मंदिर - Shrinathji Mandir Ghasiyar
घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां और दुर्गम मार्ग इसे सुरक्षा की दृष्टि से आदर्श बनाते थे।
गोस्वामी गिरधरजी महाराज ने यहां लाखों रुपये व्यय कर नाथद्वारा की तर्ज पर दुर्गनुमा हवेली-मंदिर का निर्माण करवाया।
जब मंदिर तैयार हुआ तो श्रीनाथजी को वहां प्रतिष्ठित किया गया।
जब जंगल में बस गया नया नाथद्वारा
घसियार पहुंचने के बाद वहां धीरे-धीरे एक नई धार्मिक बस्ती विकसित होने लगी।
मंदिर के आसपास गलियां बनीं, सेवायत परिवार बसने लगे, उत्सव आयोजित होने लगे और जंगलों में भी भक्ति की गूंज सुनाई देने लगी।
घसियार कुछ समय के लिए वास्तव में "दूसरा नाथद्वारा" बन गया।
घसियार का कठिन जीवन
यद्यपि घसियार सुरक्षा की दृष्टि से आदर्श था, लेकिन वहां का वातावरण सभी के लिए अनुकूल नहीं था।
पर्वतीय जलवायु, सीमित सुविधाएं और कठिन जीवन परिस्थितियों ने अनेक चुनौतियां पैदा कीं।
पुष्टिमार्गीय परंपराओं में उल्लेख मिलता है कि इसी अवधि में गोस्वामी गिरधरजी महाराज के तीन पुत्रों का असामयिक निधन हुआ। इस घटना ने पूरे परिवार को गहराई से प्रभावित किया।
पुनः नाथद्वारा वापसी
कुछ वर्षों बाद जब मेवाड़ की स्थिति सामान्य होने लगी और बाहरी संकट कम हो गए, तब श्रीनाथजी को पुनः नाथद्वारा लाने का निर्णय लिया गया।
हल्दीघाटी और खमनोर क्षेत्र से होकर श्रीनाथजी की शोभायात्रा वापस नाथद्वारा पहुंची।
कई वर्षों के अंतराल के बाद जब प्रभु पुनः अपने मूल मंदिर में विराजमान हुए, तो पूरे क्षेत्र में उत्सव का वातावरण बन गया।
महाराणा भीमसिंह स्वयं नाथद्वारा पहुंचे और प्रभु के दर्शन कर अनेक मनोरथ संपन्न कराए। परंपराओं के अनुसार उन्होंने अनेक गांव भी मंदिर को भेंट स्वरूप प्रदान किए।
आज भी जीवित है वह इतिहास
आज नाथद्वारा विश्वविख्यात तीर्थ है, लेकिन घसियार और चौपासनी उस महान यात्रा के दो ऐसे अध्याय हैं जिन्हें अधिकांश श्रद्धालु नहीं जानते।
चौपासनी हमें उस समय की याद दिलाता है जब श्रीनाथजी मारवाड़ में विराजमान थे, जबकि घसियार उस कठिन दौर का साक्षी है जब आस्था को बचाने के लिए प्रभु को अरावली की दुर्गम घाटियों में शरण लेनी पड़ी।
निष्कर्ष
गोवर्धन से चौपासनी, चौपासनी से नाथद्वारा, नाथद्वारा से उदयपुर, उदयपुर से घसियार और फिर पुनः नाथद्वारा तक की यात्रा भारतीय इतिहास में धर्मरक्षा की सबसे अद्भुत गाथाओं में से एक है।
यह केवल एक विग्रह की यात्रा नहीं थी, बल्कि उन असंख्य भक्तों, आचार्यों, राजाओं और वीरों की यात्रा थी जिन्होंने हर परिस्थिति में अपनी आस्था की रक्षा की।
आज जब श्रद्धालु नाथद्वारा में श्रीनाथजी के दर्शन करते हैं, तब उन्हें घसियार की पहाड़ियों, चौपासनी की चरण चौकी और मेवाड़ के उन वीरों को भी स्मरण करना चाहिए, जिनकी बदौलत यह दिव्य परंपरा आज तक सुरक्षित है।
