राजस्थान में नाथद्वारा का नाम सुनते ही मन में श्रीनाथजी की भव्य हवेली और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का चित्र उभर आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि नाथद्वारा से लगभग 20 से 25 किलोमीटर दूर अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित घसियार गांव में भी श्रीनाथजी का एक ऐतिहासिक मंदिर है, जिसका संबंध सीधे उस कालखंड से है जब मेवाड़ अशांति, युद्ध और लूटपाट से जूझ रहा था।
यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि उस संघर्षपूर्ण समय की जीवंत स्मृति है जब श्रीनाथजी को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें नाथद्वारा से हटाकर अरावली की दुर्गम घाटियों में लाया गया था। आज भी घसियार का यह मंदिर पुष्टिमार्गीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
श्रीनाथजी का मेवाड़ आगमन
सन् 1669 ईस्वी में मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा मंदिर-विध्वंस की नीति अपनाए जाने के बाद गोवर्धन पर्वत पर विराजमान श्रीनाथजी को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का निर्णय लिया गया।
ब्रज से प्रारंभ हुई यह यात्रा आगरा, कोटा, किशनगढ़, पुष्कर और जोधपुर के चौपासनी होते हुए मेवाड़ पहुंची। मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने श्रीनाथजी को संरक्षण दिया और वर्तमान नाथद्वारा के निकट सिंहाड़ गांव में उनके लिए हवेली शैली का मंदिर बनवाया। फरवरी 1672 ईस्वी में श्रीनाथजी वहां प्रतिष्ठित हुए और यही स्थान आगे चलकर नाथद्वारा कहलाया।
लगभग 130 वर्ष बाद फिर आया संकट
नाथद्वारा में श्रीनाथजी की सेवा-पूजा सुचारु रूप से चलती रही, लेकिन अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में मेवाड़ की राजनीतिक स्थिति अस्थिर होने लगी।
अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र के मेरों के आक्रमण, पिंडारियों की लूटपाट तथा मराठा सरदारों जसवंतराव होल्कर और दौलतराव सिंधिया के संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया। नाथद्वारा जैसे समृद्ध धार्मिक नगर पर भी संकट मंडराने लगा।
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पुष्टिमार्गीय परंपराओं और मंदिर इतिहास के अनुसार होल्कर तथा सिंधिया संघर्ष के दौरान नाथद्वारा की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न हुई। ऐसी परिस्थिति में तत्कालीन तिलकायत गोस्वामी श्री गिरधरजी महाराज ने श्रीनाथजी के लिए अधिक सुरक्षित स्थान खोजने का निर्णय लिया।
पहले उदयपुर, फिर घसियार
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए महाराणा भीमसिंह ने श्रीनाथजी को उदयपुर लाने की अनुमति प्रदान की। परंपरागत विवरणों के अनुसार वि.सं. 1858 (1802 ई.) में श्रीनाथजी, श्री नवनीतप्रियजी तथा अन्य स्वरूपों को नाथद्वारा से उदयपुर लाया गया।
उदयपुर में उनका अत्यंत भव्य स्वागत किया गया। लगभग दस माह और नौ दिन तक प्रभु उदयपुर में विराजमान रहे। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई थीं।
इसी बीच अरावली की पहाड़ियों में स्थित घसियार में एक सुरक्षित हवेली-मंदिर का निर्माण कराया गया, जहां किसी भी आक्रमणकारी सेना का पहुंचना अत्यंत कठिन था।
घसियार की यह हवेली की नाथद्वारा हवेली से काफी समानता है। इस हवेली में कई दरवाजे और चौक हैं जिनका नामकरण भी नाथद्वारा हवेली जैसा ही है। हवेली के चारों तरफ परकोटा मौजूद है।
क्यों चुना गया घसियार?
घसियार का चयन केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी किया गया था।
यह क्षेत्र चारों ओर से पहाड़ियों, जंगलों और प्राकृतिक अवरोधों से घिरा हुआ था। उस समय यहां तक पहुंचने के मार्ग भी अत्यंत सीमित थे। इसलिए यदि किसी आक्रमणकारी सेना को यहां तक पहुंचना होता तो उसे कठिन पहाड़ी मार्गों से गुजरना पड़ता।
इसी सुरक्षा कारण से घसियार को श्रीनाथजी के अस्थायी निवास के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान माना गया।
घसियार में बना दूसरा नाथद्वारा
गोस्वामी श्री गिरधरजी महाराज ने घसियार में नाथद्वारा की तर्ज पर एक हवेली-मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर को इस प्रकार बनाया गया कि श्रीनाथजी की सेवा-पद्धति, उत्सव और परंपराओं में कोई व्यवधान न आए।
जब श्रीनाथजी यहां पधारे तो धीरे-धीरे सेवायत परिवार, भक्त और व्यापारिक गतिविधियां भी यहां आने लगीं। कुछ समय के लिए घसियार वास्तव में "दूसरा नाथद्वारा" बन गया।
यहां नित्य दर्शन, राजभोग, उत्सव और पुष्टिमार्गीय परंपराओं का पालन उसी प्रकार किया जाता था जैसे नाथद्वारा में होता था।
घसियार का वातावरण और चुनौतियां
यद्यपि घसियार सुरक्षा की दृष्टि से आदर्श स्थान था, लेकिन वहां का जीवन सरल नहीं था। पर्वतीय क्षेत्र, सीमित संसाधन और कठिन जलवायु ने सेवायत परिवारों के सामने अनेक चुनौतियां खड़ी कीं।
पुष्टिमार्गीय परंपराओं में उल्लेख मिलता है कि इसी अवधि में गोस्वामी गिरधरजी महाराज के परिवार को भी कई व्यक्तिगत दुखों का सामना करना पड़ा।
फिर भी सेवा-पद्धति और उत्सवों में कोई कमी नहीं आने दी गई।
पुनः नाथद्वारा वापसी
कुछ वर्षों बाद जब मेवाड़ की राजनीतिक स्थिति सामान्य होने लगी और बाहरी संकट कम हो गए, तब श्रीनाथजी को पुनः नाथद्वारा लाने का निर्णय लिया गया।
परंपरागत विवरणों के अनुसार घसियार में कई वर्षों तक विराजमान रहने के बाद श्रीनाथजी हल्दीघाटी और खमनोर क्षेत्र से होते हुए पुनः नाथद्वारा पहुंचे।
उनकी वापसी पर नाथद्वारा में उत्सव जैसा वातावरण बन गया और तब से लेकर आज तक श्रीनाथजी अपने मूल धाम नाथद्वारा में विराजमान हैं।
आज का घसियार मंदिर
यद्यपि श्रीनाथजी का मूल स्वरूप अब नाथद्वारा में है, फिर भी घसियार का मंदिर पुष्टिमार्गीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
आज भी यहां नियमित सेवा-पूजा, उत्सव और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। मंदिर का शांत वातावरण, चारों ओर फैली अरावली की हरियाली और ऐतिहासिक महत्व श्रद्धालुओं को विशेष रूप से आकर्षित करता है।
मंदिर में दीवाली के बाद गोवर्धन के दिन खैंखरा पर्व मनाया जाता है जिसमें गायों को रिझाया जाता है। इसमें ग्वाले गायों के बछड़ों को लेकर भागते हैं जिससे गायें भड़क जाती हैं और उनके पीछे भागती हैं।
नाथद्वारा आने वाले अनेक जानकार वैष्णव श्रद्धालु घसियार जाकर उस स्थान के दर्शन अवश्य करते हैं जहां कभी स्वयं श्रीनाथजी ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण काल व्यतीत किया था।
निष्कर्ष
घसियार का श्रीनाथजी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था की रक्षा, मेवाड़ की धर्मनिष्ठा और पुष्टिमार्ग की जीवंत परंपरा का प्रतीक है।
जब-जब इतिहास ने परीक्षा ली, तब-तब भक्तों, आचार्यों और मेवाड़ के शासकों ने मिलकर श्रीनाथजी की सेवा और परंपरा की रक्षा की। घसियार उसी संघर्ष, समर्पण और श्रद्धा की अमर गाथा का साक्षी है।
आज भी जब कोई श्रद्धालु घसियार की शांत पहाड़ियों के बीच स्थित इस मंदिर में पहुंचता है, तो उसे केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास के उस अध्याय के दर्शन होते हैं जिसने श्रीनाथजी की परंपरा को सुरक्षित रखा और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया।
